मंदिर निर्माण की द्रविड़ शैली के संबंध में संक्षिप्त वर्णन : पल्लव और चोल के योगदान

 मंदिर निर्माण की द्रविड़ शैली के संबंध में संक्षिप्त वर्णन : पल्लव और चोल के योगदान


प्रश्न: पल्लव और चोल दोनों ने दक्षिण भारत के संरचनात्मक मंदिरों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उदाहरणों के साथ व्याख्या कीजिये। (250 शब्द)

दृष्टिकोण

  • मंदिर निर्माण की द्रविड़ शैली के संबंध में संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत कीजिए।
  • मंदिर निर्माण की द्रविड़ शैली में पल्लवों के योगदान को रेखांकित कीजिए।
  • मंदिर वास्तुकला में चोलों का योगदान तथा इसकी अनन्य विशेषताओं का विस्तृत वर्णन कीजिए।

उत्तर

मंदिर निर्माण की द्रविड़ शैली, दक्षिण भारत की स्थापत्य कला को प्रदर्शित करती है। दक्षिण भारत में मंदिर निर्माण को अपने प्रारम्भिक काल में चालुक्यों एवं पल्लवों का संरक्षण प्राप्त हुआ तथा कालांतर में इसे चोल शासकों द्वारा संरक्षण प्रदान किया गया।

पल्लव शासकों का योगदान

6वीं से 9वीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर शासन करने वाले पल्लव शासकों ने सर्वप्रथम द्रविड़ शैली के विकास में अपना योगदान दिया। यह शैली शैलोत्कीर्ण मंदिरों से एकाश्मक रथों के रूप में तथा अंततः संरचनात्मक मंदिरों के रूप में विकसित हुई।

संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण सर्वप्रथम राजसिंह / नरसिंहवर्मन द्वितीय द्वारा करवाया गया था। महाबलीपुरम का शोर मंदिर इस शैली के सबसे उत्कृष्ट मंदिरों में से एक है। इसमें पिरामिडनुमा आकृति के दो मंदिर हैं, जिसमें एक भगवान शिव को तथा दूसरा भगवान विष्णु को समर्पित है। इसके अतिरिक्त, कांची का कैलाशनाथ मंदिर पल्लव कालीन शैलोत्कीर्ण कला का अद्भुत उदाहरण है।

पल्लव कला का अंतिम चरण, बाद के पल्लव शासकों द्वारा बनवाए गए संरचनात्मक मंदिरों में प्रदर्शित होता है जिसमें बैकुंठपेरुमल मंदिर, मुक्तेश्वर मंदिर आदि शामिल हैं।

चोलकालीन संरचनात्मक मंदिर 

चोल शासकों द्वारा पल्लव वास्तुकला का अनुसरण एवं उसमें संशोधन किया गया। चोलकालीन मंदिरों की विशेषताएं निम्नलिखित हैं: 

  • पत्थरों का व्यापक प्रयोग और मंदिरों का अलंकरण।
  • जहाँ पल्लव काल में दीवारों पर शेरों के चित्र उत्कीर्ण किए गए थे वही चोल काल में दीवारों को देवी-देवताओं और राजा एवं रानियों की मूर्तियों एवं चित्रों से अलंकृत किया गया।
  • सीढ़ीनुमा पिरामिड के रूप में एक शिखर, जिसे विमान कहा जाता था चोलकालीन मंदिरों का प्रमुख लक्षण था।
  • मंदिर प्रांगण के अंदर जल कुंड की उपस्थिति।
  • चोल शासनकाल के मंदिरों में मुख्यद्वार को प्रमुखता मिली जबकि इसे पल्लव काल में छोटा बनाया जाता था।
  • पल्लव काल में मंदिरों में द्वारपाल जहाँ सौम्य स्वभाव वाले थे, वहीं चोलकालीन द्वारपालों को अत्यधिक उग्र स्वभाव का दिखाया गया है।

उपर्युक्त सभी विशेषताएं दो सबसे महत्वपूर्ण चोल मंदिरों में विद्यमान थीं। जोकि निम्नलिखित हैं:

  • पहला, तंजौर स्थित बृहदेश्वर मंदिर। इसका निर्माण राजराज प्रथम द्वारा करवाया गया था। इसमें विमान (सबसे ऊंचे विमानों में से एक), अर्धमंडप, महामंडप स्थित हैं तथा साथ ही सामने एक बड़ा मंडप भी है जिसे नंदीमंडप कहा जाता है।
  • दूसरा, राजेंद्र चोल द्वारा निर्मित गंगईकोंड चोलपुरम।

इसलिए, चोल शासकों के प्रत्यक्ष संरक्षण के कारण, चोल वास्तुकला, मंदिर वास्तुकला के विकास में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है।

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