Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 3 अति सूधो सनेह को मारग है

 Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 3 अति सूधो सनेह को मारग है

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 3 अति सूधो सनेह को मारग है

bihar board hindi poem

class – 10

subject – hindi

lesson – 3

अति सूधो सनेह को मारग है
मो अँसुवानिहि लै बरसौ
―――――――――――――
-घनानंद
कविता का सारांश
―–―――――――
‘अति सूधों सनेह को मारग है’ सबैया में कवि घनानंद सेह के मार्ग की प्रस्तावना करते हुए कहते हैं कि प्रेम का रास्ता अत्यंत सरल और सीधा है वह रास्ता कहीं भी टेडा-मेढ़ा नहीं है और न उसपर चलने में चतुराई की जरूरत है। इस रास्ते पर वही चलते हैं जिन्हें न अभिमान होता है न किसी प्रकार की झिझक ऐसे ही लोग निस्संकोच प्रेम-पथ पर चलते हैं।
धनानंद कहते हैं कि प्यारे, यहाँ एक ही की जगह है दूसरे की नहीं। पता नहीं, प्रेम करनेवाले कैसा पाठ पढ़ते हैं कि मन’ लेते हैं लेकिन छटॉक नहीं देते। ‘मन’ में श्लेष अलंकार है जिससे भाव की गहनता और भाषा का सौंदर्य दुगुना हो गया है।
‘मी अँसुवानिहिं लै बरसौ’ सवैया में कवि घनानंद मेघ के माध्यम से अपने अंतर को वेदना को व्यक्त करते हुए कहते हैं-बादलों । परहित के लिए ही शरीर धारण किया है। वे अपने आँसुओं की वर्षा एक समान सभी पर करते हैं। पुनः घनांनद बादलों से कहते हैं तुम तो जीवनदायक हो, कुछ
मेरे इदय की भी सुध ली, कभी मुझ पर भी विश्वास कर मेरे आँगन में अपने रस की वर्षा करो।

सरलार्थ
―――――
रीतियुगीन काव्य में घनानंद रीतिमुक्त काव्यधारा के सिरमौर कवि हैं। इनकी कविताओं में पीड़ा, मस्ती और वियोग सब कुछ है। वियोग में सच्चा प्रेमी जो वेदना सहता है, उसके चित्त में जो विभिन तरंगें उठती हैं, उनका चित्रण घनानंद ने किया है। घनानंद ने वियोग दशा का चित्रण करते समय अलंकारों, रूढ़ियों का सहारा न लेकर मनोविकारों या वस्तुओं को नया आयाम दिया है। वस्तुतः घनानंद ‘प्रेम की पीर’ के कवि हैं।
रीतिकाल के शास्त्रीय युग में उन्मुक्त प्रेम के स्वच्छंद पथ पर चलनेवाले महान प्रेमी कवि घनानंद के दो सवैये प्रस्तुत पद में हैं । प्रथम छंद में कवि प्रेम के सीधे-सरल और निश्छल मार्ग की प्रस्तावना करता है। प्रेम एक ऐसा अमृतमय मार्ग है जहाँ चातुर्य की टेढ़ी-मेढ़ी रूपरेखा नहीं
है। इसमें छल, कपट, श्लेष-मात्र भी नहीं है। मन के मनोभावों को अनायास प्रदर्शित करने में सहज भाव उत्पन्न हो जाता है।
दूसरे पद में मेघ की अन्योक्ति के माध्यम से कवि विरह-वेदना से भरे अपने हृदय की पीड़ा को अत्यंत कलात्मक रूप में अभिव्यक्ति देता है । बादल अपने लिए नहीं दूसरों के लिए शरीर धारण करता है । कवि का विरह-चित्त मिलन के लिए उत्कठित है। जल से परिपूर्ण बादल अपनी वेदना के साथ एक नया भाव जोड़ देता है। जीवन की अनुभूति प्रेम की सहभागिता में है । गगन
की सार्थकता मेघाच्छादन से है।

पद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न
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1. अति सुधो सनेह को मारग है। जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलें तजि आपनपौ झुझुकै कपटी जे निसाँक नहीं।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-घनानंद ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-अति सुघो सनेह को मारग है ।

(iii) कवि ने किसे सनेह का मार्ग कहा है?
उत्तर-कवि अति सरलता, सहजता, को सनेह का मार्ग कहता है। यहाँ किसी भी प्रकार की चतुराई या टेढ़ापन नहीं दिखता है। यहाँ तो निर्मलता और त्याग दिखता है।

(iv) प्रेम मार्ग में किस बात की गुंजाइश नहीं रहती?
उत्तर-प्रेम मार्ग में कपट, अविश्वास की कोई गुंजाइश नहीं रहती। यह मार्ग तो सच्चा मार्ग है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें ।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “अति सुधो सनेह को मारग है” काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग सुजान और घनानंद के बीच के प्रेम-प्रसंग से जुड़ा हुआ है। कवि कहता है कि अति सरलता ही सनेह का मार्ग है, पंथ है। यहाँ जरा-सी भी ठगई या चतुराई नहीं है। टेढ़ापन नहीं है। ओछी होशियारी नहीं है। यहाँ सत्य मार्ग पर चलना पड़ता है। यहाँ अपनों का भी त्याग करना पड़ता है। बिना शंका के यहाँ चलना पड़ता है। कहने का मूल भाव यह है कि प्रेम का, स्नेह का मार्ग छल-छदम् से मुक्त होता है। वहाँ बनावटीपन, सयानापन, टेढ़ापन, अहंकार या चतुराई नहीं रहती। वहाँ तो त्याग, प्रेम, अंतरंगता दिखाई पड़ती है। इस प्रकार स्नेह का मार्ग सदा से ही सरलता का रहा है निष्कपटता और सहजता का रहा है।

2. ‘घनानंद’ प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ कहौ मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-घनानंद ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-अति सुघो सनेह को मारग है ।

(iii) ‘दूसरौ आँक नहीं’ पंक्ति में कवि का क्या भाव छिपा हुआ है?
उत्तर कवि सुजान के प्रेम में बँधा हुआ है। वह कहता है कि ऐ सुजान, सुनो! तुम्हारे हृदय में भले ही मेरा स्थान हो, न हो किन्तु, मेरे दिल में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं है। इन पंक्तियों द्वारा सुजान के प्रति कवि के समर्पित भाव का पता चलता है। इसी कारण ‘दूसरे के लिए कोई स्थान नहीं” ऐसा कहकर घनानंद सुजान को अपनी एकनिष्ठ प्रेम-भावना से अवगत कराते हैं।

(iv) ‘मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं’ का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर-उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में कवि घनानंद ने सुजान की चतुराई का वर्णन किया है। कवि कहता है कि ऐ सुजान! तुमने कैसा पाठ पढ़ा है कि लेने के लिए मन से लेती हो मगर देने के लिए छटाँक का भी त्याग नहीं करती हो।
यहाँ मन से द्वि-अर्थ स्पष्ट झलकता है। एक मन ऐन्द्रिय-संबंधी है, दूसरा वजन-संबंधी। दोनों रूपों में सुजान चतुर है, समझदार है जबकि घनानंदजी सीधे, सरल, निष्कपटी हैं उन्हें सुजान की चतुराई और व्यवहार पर अचरज होता है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें ।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “अति सुघो सनेह को मारग है” नामक काव्य पाठ से ली गयी है।
इन पंक्तियों का प्रसंग सुजान और घनानंद के बीच के प्रेम-प्रसंग से है। कवि कहता है कि ऐ सुजान! सुनो! हमारे दिल में तो तुम्हारे सिवा किसी दूसरे का स्थान ही नहीं है। केवल तुम ही तन-मन में बसी हुई हो। लेकिन मैं तो तुम्हारी चतुराई पर आश्चर्यचकित हूँ। तुमने कैसा पाठ पढ़ा है कि लेने को तो मन भर लेती हो और देने के वक्त छटाँक का भी त्याग नहीं करती हो। इन पंक्तियों में द्विअर्थ छिपा हुआ है मन का ऐन्द्रिय मन से भी संबंध है और मन का वजन वाले
मन से भी संबंध है। इन पंक्तियों में सुजान की चतुराई और घनानंद की सरलता सहजता का वर्णन मिलता है। सुजान के रूप-लावण्य पर कवि रीझ कर अपना सर्वस्व लुटा देता है। किन्तु सुजान की थाह नहीं मिलती अर्थात् उसके मन की गहराई नहीं ज्ञात हो पाती है। यहाँ लौकिक प्रेम के
साथ अलौकिक प्रेम का भी वर्णन किया है।

मो असुँबानिहिं……
――――――――――
3. परकाजहि देह को धारि फिरौ परजन्य जथारथ है दरसौ।
निधि-नीर सुधा की समान करौ सबही विधि सज्जनता सरसौ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-घनानंद ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं?
उत्तर-मो अँसुवानिहिं लै बरसौ ।

(iii) निधि-नीर का क्या काम है?
उत्तर-निधि-नीर भी बहती हुई अपनी सुधा का पान जग को कराता है। सुधा-रूपी जल से सारे जीव-जंतुओं का पोषण और पालन होता है। उसी तरह सज्जन पुरुष भी परहित के लिए ही जीते-मरते हैं।

(iv) कवि को सज्जनता कहाँ दिखायी पड़ती है?
उत्तर-बादल और निधि-नीर में कवि को सज्जनता के गुण दिखते हैं क्योंकि ये दोनों लोकहित में ही लगे रहते हैं।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “मो अँसुवानिहिं लै बरसौ” काव्य पाठ से ली गयी है।
इन पंक्तियों का प्रसंग सुजान और घनानंद के बीच के प्रेम-प्रसंग से है।

कवि कहता है कि बादल परहित के लिए ही जल से वाष्ण-वास्ण से बादल का रूप धरकर इधर – उधर दौड़ता
फिरता है । इसमें उसकी यथार्थता झलकती है । जैसे
सागर या नदियाँ अपने सुधारूपों जल से लोक कल्याण के
लिए बहती रहती है । इसमें सब तरह से सज्जनता हो दिखायी पड़ती हैं । सज्जनों का भी काम परहित करना ही
है । इन पक्तियों में घनानंदजी ने अपने जीवन के प्रेम- प्रसंग
को प्रकृति के लोककल्याण रूपों से तुलना करते हुए
उसके उपकार का वर्णन किया है। प्रकृति का रूप ही लोकहितकारी है ठीक उसी प्रकार सज्जन का भी जीवन होता है।

2. ‘घनआनंद’ जीवनदायक हौ कडू मेरियो पीर हिएँ परसौ।
कबहुँ वा बिसासी सुजान के आँगन मो असुवानिहिं लै बरसी।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर-पनानंद।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-मो असुवानिहिं लै बरसौं ।

(iii) धनानंदजी किस बात का स्पर्श करने को कहते है?
उत्तर- घनानंदजी सुजान के प्रेम में इतनं रम गए हैं कि. अपनी सुध-बुध ही खो देते हैं। वे सुजान से कहते हैं कि ऐ जीवनदायिनी मेरे हृदय की पीड़ा को भी स्पर्श करो। मेरी संवेदना को भी समझो और देखो मेरे यथार्थ प्रेम-भाव को, तुम मेरे प्रति अनासक्त भाव क्यों रखती हो।

(iv) सुजान को कवि ने क्या कहा है?
उत्तर-सुजान को कवि अपनी कविताओं में बिसासी अर्थात् विश्वासी जिसपर भरोसा किया जा सके कहकर संबोधित किया है। कवि जो निर्मल भाव से सुजान से प्रेम करता है किन्तु सुजान का कवि के प्रति प्रेम है कि नहीं-विश्वास नहीं होता।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “मो असुवानिहि लै बरसौ” नामक काव्य-पाठ से ली गयी है।
इन पंक्तियों के प्रसंग सुजान और घनानंद के प्रेम-प्रसंग में दिए गए उदाहरणों से है। कवि कहता है कि हे सुजान! तुम जीवनदायिनी शक्ति हो, कुछ मेरे हृदय की पीड़ा का भी स्पर्श करो। मेरी भी संवेदना को जानो, समझो। मेरे अन्तर्मन में तुम्हारे लिए जो प्रेम है, चाह है, भूल है, उसे
भी तुम यथार्थ रूप में जानो। इन पंक्तियों में सुजान के प्रति अनन्य प्रेम-भावना प्रकट की गयी है। घनानंदजी सुजान के लिए अपनी सुध-बुध खो चुके हैं और सुजान को विश्वास ही नहीं होता। कवि कहता है कि कभी भी उस विश्वासी सुजान के आंगन में मेरे आँसू बरसने लगेंगे और अपने अन्तर्मन की व्यथा को प्रकट करने लगेंगे।

काव्य-सौंदर्य
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1. ‘मो असुवानिहिं लै बरसों सबैया किसे सम्बोधित है? क्यों?
या, द्वितीय छंद किसे सम्बोधित है और क्यों?
उत्तर-रसमूर्ति घनानंद का प्रस्तुत छंद बदलों को सम्बोधित है। कवि पाता है कि बादल बड़े परोपकारी हैं। इन्होंने अपना शरीर ही परमार्थ के लिए धारण किया है। जैसे परमार्थी सज्जन निस्वार्थ रूप से दुखियों की भलाई करते हैं, वैसे ही बादल भी तप्त धरती पर ‘मेघ’ बरसा कर उसकी तपन शान्त करते और उसे हरा-मरा करते हैं। उन्हीं बादलों से क अनुरोध करता है कि उसकी प्रेम-पीड़ा को अपने सुधा से शान्त करे।

2. “असुवानिहिं लै बरसों” सबैये का भावार्थ लिखें।
या, ‘सज्जन परमार्थ के कारण ही शरीर धारण करते हैं, घनानंद रचित भावपूर्ण सवैये का अर्थ लिखिए।
उत्तर-देखें, सबैयों का सारांश अनुच्छेद 2

*कविता के साथ :-
प्रश्न 1. कवि प्रेममार्ग को ‘अति सूधो’ क्यों कहता है ? इस मार्ग की विशेषता क्या है।
उत्तर-निश्छल प्रेम जीवन के समस्त भावों में एक नया भाष जोड़ देता है। प्रेम में इर्ष्या लोभ, मत्सर आदि का कहीं भी मेल नहीं रहता है। प्रेम जीवन का एक ऐसा पावन मार्ग है जिसपर चलनेवाला पधिक कभी-भी पकता नहीं है। दो आत्माओं के बीच परस्पर सामंजस्य समापित करनेवाला प्रेम निश्चय हो एक नया अध्याय जोड़ देता है ।

प्रश्न 2. ‘मन लेहु पै देह छटाँक नहीं’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-वस्तुतः यहाँ कवि प्रेम के भावों को एक नया रूप देना चाहता है। प्रेमी और प्रेमिका, प्रेम के भावों में ऐसे बंध जाते हैं जिनसे वे मुक्त नहीं हो सकते हैं। दोनों एक-दूसरे के प्रति प्रेम अंतर्मन में धारण कर लेते हैं। यहाँ कवि मन के बराबर लेकर छटाँक न देने की स्थिति प्रकट कर अपने भावों को छुपा लेता है।

प्रश्न 3. द्वितीय छंद किसे संबोधित है और क्यों?
उत्तर-द्वितीय छंद बादल को संबोधित है। वस्तुतः बादल प्रेम का सूचक है। बादल अपने लिए नहीं औरों के लिए बना है। प्रेमी अपने लिए नहीं प्रेमिका के लिए सर्वस्व समर्पण कर देता है। बादल ‘अग्नि’ धारण करने पर भी अर्थात् दग्ध हृदय के आसुओं से प्रेरित होकर भी, जल बरसाता है।

प्रश्न 4. परहित के लिए ही देह कौन धारण करता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-दूसरों के लिए शरीर धारण करनेवाले सतत् अपना जीवन समर्पण करने के लिए उडत् रहते हैं। बादल अपने लिए नहीं संसार के लिए अवतरित होता है । जन कल्याण ही उसका प्रमुख कार्य है। जल से परिपूर्ण रहने पर भी वादल अपने में अग्नि समाविष्ट किये रहता है।

प्रश्न 5. कवि कहाँ अपने आँसुओं को पहुंचाना चाहता है और क्यों ?
उत्तर-कवि आँसू के माध्यम से विरह विकल आत्मा द्वारा प्रेमिका के अंतर्मन को छु लेना चाहता है। आँख में आँसू दृष्टिगत नहीं होता है, किन्तु अश्रुधारा निरंतर बहती है। कवि अपने आँसू को उन सज्जनों के आँगन में पहुँचाना चाहता है जहाँ प्रेम की वर्षा होती है। प्रेम की वर्षा अपने लिए नहीं औरों के लिए होती है।

प्रश्न 6. व्याख्या करें।
(क) यहाँ एक ते दूसरौं आँक नहीं।
(ख) कडू मेरियो पीर हिएँ परसौ ।
उत्तर-(क) प्रस्तुत पंक्ति ‘प्रेम की पीर’ की अनुभूति रखनेवाले घनानंद द्वारा रचित है। इसमें कवि अपने अंतर्मन को उन भावों में समर्पित कर देना चाहता है जहाँ प्रेम का अभाव है। रिक्त भावों में एक ऐसा चिह्न प्रदर्शित करना चाहता है जो अमिर भावों से सबका पथ प्रदर्शित करता
रहे। प्रेम एक ऐसा मार्ग है जिसपर पथिक को एक न एक दिन चलना पड़ता है। वैर भाव रखनेवाले भी इस पथ पर चलने के लिए विवश हो जाते हैं। प्रेम मार्ग ही जीवन का सुखद मार्ग है।

(ख) प्रस्तुत पक्ति धनानंद द्वारा रचित है। प्रेम को विरह-वेदना विकल आत्मा दीपशिखा के समान अनवरत जलती रहती है। वियोग में जीनेवाले सच्चे प्रेमी, अपने भावों को प्रदर्शित करने में भी समर्थ नहीं हो पाते हैं। कवि का कहना है कि विरह में दूसरों के द्वारा स्पर्श मात्र से ही
जीवन में एक अन्य धारा बह पड़ती है। मेरे हृदय को छूकर कोई यह जान ले कि विरह में अग्नि की धधक से हृदय कैसे जलता रहता है।

भाषा की बात
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प्रश्न 1. निम्नांकित शब्द कविता में संज्ञा अथवा विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैं । इनके प्रकार बताएं-
सूधो, मारग, नेकु, बाँक, कपटी, निसाँक, पाटी, जथारथ, जीवनदायक, पीर, हिएं, विसासी।
उत्तर- सूधो ― गुणवाचक विशेषण
मारग ― जातिवाचक संज्ञा
नेक ― गुणवाचक विशेषण
अकि ― भाववाचक संज्ञा
कपटी ― गुणवाचक विशेषण
निसांक ― गुणवाचक विशेषण
पाटी ― भाववाचक संज्ञा
जरारथ ― भाववाचक संज्ञा
जीवनदायक ― गुणवाचक विशेषण
पीर ― भाववाचक संज्ञा
हिएं ― जातिवाचक संज्ञा
विसासी ― गुणवाचक विशेषण

प्रश्न 2. कविता में प्रयुक्त अव्यय पदों का चयन करें और उनका अर्थ भी बताएँ।
उत्तर-अति = बहुत ।
जहाँ – स्थान विशेष ।
नहीं = न ।
तजि = छोड़कर।
यहाँ = स्थान-विशेष ।
नेकु = तनिक भी ।

प्रश्न 3. निम्नलिखित के कारक स्पष्ट करें:
सनेह को मारग, प्यारे सुजान, मेरियो पीर, हियें, अँसुवानिहि, मों।
उत्तर- सनेह को मार्ग : संबंध कारक
मेरियो पीर : अधिकरण कारक
प्यारे सुजान : संबंध कारक
हिएँ : अधिकरण कारक
अँसुवानिहि : करण कारक
मो : कर्म कारक

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