Bihar board SST notes class 8th civics chapter 5 न्यायपालिका

 Bihar board SST notes class 8th civics chapter 5 न्यायपालिका

Bihar board SST notes class 8th civics chapter 5 न्यायपालिका

Bihar board SST notes class 8th civics chapter 5

                        न्यायपालिका
पाठ का सारांश-आपसी विवाद-झगड़े का निपटारा बड़े-बुजुर्ग करते हैं या फिर लोग पंचायत के पास जाते हैं। हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है। यहाँ कानून का शासन चलता है जो सभी लोगों पर एक समान रूप से लागू होता है। हमारे देश में कानून के अनुसार अलग-अलग तरह के विवादों का निपटारा करने के लिए एक व्यवस्था बनाई गई है जिसमें कई प्रकार की अदालतें हैं। लोग न्याय पाने के लिए इन अदालतों में जाते हैं

न्याय की समझ:–  न्याय की दृष्टि से यह तय करना आसान नहीं होता कि कौन गलत है और कौन सही। इसके लिए न्यायपालिका में मुकदमों को सुलझाने की एक लम्बी प्रक्रिया होती है। पक्ष-विपक्ष के वकील बहस करते हैं और अपने-अपने मामले के पक्ष में दलीलें पेश करते हैं जिन्हें न्यायाधीश गौर से सुनते हैं और कानूनों के परिप्रेक्ष्य में अपना फैसला सुनाते हैं।

न्यायपालिका की भूमिका:—सरकार तीन अंगों की सहायता से कार्य करती है। ये तीन अंग हैं—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका । विधायिका कानून बनाती है और कार्यपालिका (यानी अफसरों की श्रेणी) उस कानून को लागू करती है। जैसे दो व्यक्तियों के बीच झगड़ा होता है, वैसे ही जब कभी केन्द्र और राज्य सरकार के बीच झगड़ा या विवाद की स्थिति उत्पन्न हो तो इसे सुलझाने के लिए किसी निकाय (संस्था) की जरूरत पड़ती है जो बिना किसी पक्षपात या दबाव में आकर अपना कार्य कर सके। इसी न्यायिक व्यवस्था को न्यायपालिका कहा जाता है।
न्यायपालिका का कार्य नागरिकों के अधिकारों एवं उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करना है। न्यायपालिका न्याय करती है और विवादों को संविधान में उल्लेखनीय कानून के अन्तर्गत सुलझाती है। अगर कभी विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका के पास अधिकार होता है कि वह ऐसे कानून को रद्द कर दें। दरअसल, संविधान की व्याख्या का अधिकार मुख्य रूप से न्यायपालिका के पास ही होता है।

स्वतंत्र न्यायपालिका–न्यायपालिका का स्वतंत्र होना बहुत जरूरी है। हर हाल में न्यायपूर्ण फैसला होने के लिए यह जरूरी है कि न्यायाधीश अपना फैसला किसी भी पक्ष के दबाव या किसी भी प्रकार के भय से मुक्त होकर सुना सकें। सिद्धांत रूप में कोई भी ताकतवर मंत्री या सरकार किसी न्यायालय के न्यायाधीश पर दबाव नहीं डाल सकते । हमारे देश को न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्र रखा गया है।
न्यायपालिका को स्वतंत्र रखने के लिए दो तरीके अपनाये गये हैं-
1. शक्तियों का बँटवारा-विधायिका और कार्यपालिका जैसी राज्य की शाखायें न्यायपालिका के काम में दखल नहीं दे सकती । न तो कोई अदालत सरकार के अधीन होती है और न ही सरकार का प्रतिनिधित्व करती है।
2. सर्वोच्च और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का सीधा हस्तक्षेप नहीं होता है।
न्याय के उद्देश्य से न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाया गया है। पर, कई बार ताकतवर नेताओं और धनी लोगों के प्रभाव में आकर कुछ न्यायाधीश गलत फैसला दे देते हैं। इससे न्याय को धक्का लगता है और न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है। भारत में न्याय प्रक्रिया में सुधार की कई कोशिशें की जा रही हैं ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता व लोगों का उस पर विश्वास बना रहे।

भारत में न्यायपालिका की संरचना-भारत में न्यायपालिका की संरचना पिरामिड की तरह है जो तीन स्तरों पर कार्य करती है। सबसे नीचे जिला और अधीनस्थ न्यायालय, फिर उच्च न्यायालय तथा सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय होता है। जिला न्यायालय होता है जिला मुख्यालय में जहाँ जिला न्यायाधीश होते हैं। राज्य के हर जिले में यह व्यवस्था होती है।
किसी राज्य की राजधानी में (जैसे बिहार राज्य के पटना में) उच्च न्यायालय होता है। सबसे ऊपर होता है सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)। यह हमारे देश का सबसे बड़ा न्यायालय है।
सर्वोच्च न्यायालय देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित है। ऊपरी अदालत द्वारा लिया गया निर्णय नीचे की सारी अदालतों को मानना होता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले देश की तमाम अदालतों को मानना होता है। नीचे की अदालत के फैसले से असंतुष्ट होने पर वादी के लिए ऊपर के अदालत में अपील करने का भी प्रावधान है।

आम इंसान की न्याय तक पहुँच – न्यायिक व्यवस्था वैसे तो सिद्धांतत: नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं करती पर यह भी नितांत सत्य है कि गरीब इंसान के लिए हमारी न्यायपालिका से न्याय मिलना बेहद मुश्किल भरा कार्य है। केस सालों-साल खिंचते हैं जिसमें बहुत पैसा खर्च होता है। अदालत का फैसला वर्षों बाद आता है और वह भी न्यायपूर्ण ही होगा, कहना मुश्किल है। कई बार तो केस लड़ने वाले केस के बीच में ही मर जाते हैं और कितनों को तो इंसाफ मिलता ही नहीं। सारी जमा पूँजी खर्च कर भी वे ठगे ही रह जाते हैं । फिर भी, देश में न्यायिक व्यवस्था का संचालन न्यायपालिका के बिना सोच पाना मुश्किल है।
                         पाठ में आए प्रश्नों के उत्तर
1. बच्चों के पिता ने क्या जवाब दिया होगा? सोचकर लिखिए ।
उत्तर–बच्चों के पिता ने दोनों बच्चों को डाँटा होगा कि तुम दोनों ही बदमाशी किये हो। उन्होंने यह भी कहा होगा कि आगे से आपस के झगड़े में किताब-कॉपी मत फाड़ना नहीं तो दोनों को खूब मार पड़ेगी।
2. आपकी समर में कौन सही है—गीता या उसके भाई ? आपस में चर्चा कीजिए।
उत्तर-गीता के भाई गलत थे। पिता की संपत्ति में सभी संतान का बराबर का हिस्सा होता  है। अत: गीता को भी अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए था। अत: गीता सही थी। उसकी माँग सही थी। उसे भी अपने पिता की संपत्ति में से हिस्सा मिलना चाहिए था । यदि उसके भाई उसे स्वेच्छा से कुछ कम राशि भी दे देते तो वह खुशी से वह स्वीकार कर संतोष कर लेती।
पर भाइयों ने उसे कुछ भी रकम नहीं दिया तो अदालत ने उसे बराबर का भागीदार बना अच्छी बल्कि भाइयों के समान राशि ही दिलवा दी। अतः मेरी समझ में गीता के भाई गलत थे और गीता सही थी।
3. क्या आप ग्राम कचहरी के फैसले से सहमत हैं ?
उत्तर-नहीं, ग्राम कचहरी के लोगों की मानसिकता गलत थी। अदालत ने उनके फैसले को खारिज कर उन्हें यह एहसास करा दिया होगा कि वे गलत हैं । वे पुरानी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जो नये संविधान और नये कानूनों की रोशनी से नितांत दूर हैं। मैं भी ग्राम कचहरी के फैसले से सहमत नहीं हूँ।
4. अदालत ने गीता के पक्ष में क्या फैसला सुनाया और क्यों ?
उत्तर—अदालत ने गीता के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत उत्तराधिकार अधिनियम के तहत पिता की संपत्ति में बेटा हो या बेटी, सभी बराबर के हकदार फैसला था कि हिन्दू हैं। अत: गीता के भाइयों को अपनी पैतृक संपत्ति का बंटवारा चार भागों में करना होगा । गीता को अदालत के फैसले से तीन लाख रुपए मिल गये। उसके तीन भाई और वह चारों के बीच पिता की जमीन को बेचकर भाइयों ने जो बारह लाख रुपये आपस में बाँट लिये थे, उन्हें उसमें से तीन लाख रुपये गीता को देना पड़ा।अदालत ने गीता के अधिकारों की रक्षा करने के लिए उसके हक में फैसला सुनाया जो कि हमारे संविधान में उल्लेखित कानून के तहत आता है।
5. इस कहानी को पढ़ने के बाद न्याय के बारे में आपकी क्या समझ बनती है ? इस पर अपनी शिक्षिका के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर-इस कहानी को पढ़ने के बाद मैं समझता हूँ कि न्याय लोगों के अधिकारों व उनके सम्मान की रक्षा करने के लिए निर्मित किये गये हैं। यदि किसी व्यक्ति के साथ कहीं अन्याय होता हो, तो वह न्याय पाने के लिए न्यायपालिका का द्वार खटखटा सकता है। वहाँ उसे न्याय अवश्य मिलेगा।
6. अपने शिक्षक की सहायता से इस तालिका में दिये गये खाली स्थानों को भरिए ।
विवाद के प्रकार                                       उदाहरण
1.केन्द्र और राज्य के बीच विवाद            ………………….
2.दो राज्यों के बीच विवाद                    ………………… .
3.दो नागरिकों के बीच विवाद              …………………….
उत्तर-
1. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार लगातार मांग कर रहे हैं और केन्द्र बरावर कोई न कोई बहाना बनाकर माँग ठुकरा रहा है। यह विवाद चल ही रहा है।
2.नदी के पानी के बँटवारे को लेकर कभी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों के बीच तो कभी अन्य राज्यों का अन्य राज्य से विवाद होता ही रहता है।
3.दो नागरिकों के बीच विवाद के तो लाखों मुकदमे देश के भिन्न अदालतों में चलते ही रहते हैं।

7. न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए क्या-क्या किया गया?
उत्तर-न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका से बिल्कुल ही स्वतंत्र रखा गया । सर्वोच्च और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का सीधा हस्तक्षेप नहीं होता।
8. न्यायपालिका की स्वतंत्रता में किस-किस तरह की बाधाएँ आती हैं ?
उत्तर-कई बार यह देखने में आता है कि कुछ ताकतवर लोग अपने पैसे और पहुँच का इस्तेमाल करके न्यायपालिका की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की कोशिश करते हैं। कई बार कुछ न्यायाधीश भी पैसे व तरक्की की लालच में फंसकर गलत फैसले देते हैं। इससे लोगों को उचित न्याय नहीं मिल पाता । इस तरह के गलत कामों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को गहरा धक्का लगता है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता में इस प्रकार की घटनाएँ बड़ी बाधाएँ हैं।
                             अभ्यास के प्रश्नोत्तर
1. क्या आपको ऐसा लगता है कि इस तरह की नई न्यायिक व्यवस्था में एक आम नागरिक किसी भी ताकतवर या अमीर व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा जीत सकता है ? कारण सहित समझाइये।
उत्तर-इस तरह की नई न्यायिक व्यवस्था में एक आम नागरिक किसी भी ताकतवर या अमीर व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा तभी जीत सकता है जबकि न्यायाधीश ईमानदार हो । न्यायाधीश यदि ईमानदारीपूर्वक फैसला देगा तभी एक गरीब व्यक्ति अमीर व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा जीत पायेगा। साथ ही, उस गरीब आदमी के पास लंबी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने के लिए पर्याप्त पैसे होने चाहिए ताकि वह लंबे समय तक अपना केस लड़ सके ।
2. हमें न्यायपालिका की जरूरत क्यों है ?
उत्तर-कई बार लोगों का आपस में कुछ मुद्दों पर विवाद हो जाता है जो आपस में सुलझाना संभव नहीं होता । यहाँ तक कि स्थानीय पंचायत में भी वे विवाद नहीं सुलझ पाते । तब, फिर उस विवाद के निपटारे के लिए हमें न्यायपालिका की जरूरत पड़ती है। न्यायपालिका में संबंधित
विवाद पर पक्ष-विपक्ष के वकील बहस करते हैं । उन्हीं बहस को सुनकर हमारे संविधान में लिखित कानूनों के आलोक में न्यायाधीश न्याय करते हैं।
3. निचली अदालत से ऊपरी अदालत तक हमारी न्यायपालिका की संरचना एक पिरामिड जैसी है । न्यायपालिका की संरचना को पढ़ने के बाद उसका एक चित्र बनाएँ।
उत्तर
सर्वोच्च न्यायालय
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उच्च न्यायालय
|
जिला न्यायालय
4. भारत में न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाये गये हैं ?
उत्तर-भारत में न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाने के लिए इसे विधायिका और कार्यपालिका से सर्वथा स्वतंत्र रखा गया है। यहाँ तक कि सर्वोच्च और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार सीधे-सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोई भी ताकवर व्यक्ति न्यायाधीशों पर अपने पद या रुतबा का धौंस नहीं दिखा सकता। ऐसा करने पर वह व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने के जुर्म में दंड का भागी बन जा सकता है।
5. आपके विचार में भारत में न्याय प्राप्त करने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा कौन-सी है ? इसे दूर करने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर-कानूनी प्रक्रिया में काफी पैसा व समय लगता है और ऊपर से कागजी कार्यवाही की भी जरूरत पड़ती है। यह काम वकीलों का होता है। इस प्रक्रिया को आम लोगों के लिए समझ पाना मुश्किल होता है। गरीब इंसान के लिए यह सब कर पाना, समझ पाना और लंबी अवधि तक चलने वाले मुकदमे के लिए आवश्यक धनराशि का जुगाड़ कर पाना मुश्किल होता है। कोर्ट कचहरी के काम में समय काफी लगता है क्योंकि यह ध्यान रखना होता है कि जल्दबाजी में किसी के साथ अन्याय न हो। इस वजह से कई केस सालों-साल खिंचते जाते हैं और लोगों के लिए अपना काम-धंधा छोड़कर नियमित रूप से कोर्ट-कचहरी जा पाना मुश्किल होता है। वैसे तो ये समस्याएँ सभी वर्ग के लोगों के लिए हैं पर गरीब लोगों के लिए तो ऐसा करना बेहद मुश्किल होता है।
न्याय की प्रक्रिया में सुधार करने के लिए, सभी तरह के न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ, गरीब लोगों के लिए निःशुल्क या कम पैसों में कानूनी सहायता की व्यवस्था करना और जनहित याचिकाएँ, ये उपाय किये जाने जरूरी हैं।
6. अगर भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र न हो तो नागरिकों को न्याय प्राप्त करने के लिए किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है ?
उत्तर-अगर भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र न हो तो आम नागरिकों को न्याय प्राप्त करना मुश्किल ही नहीं, असंभव हो जाएगा। एक तो पैसे वालों का बोलबाला हो जाएगा। दूसरे दबंगों की चलती हो जाएगी। फिर तो, समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत लागू हो जाएगी। गरीब आदमी यदि अस्वतंत्र न्यायपालिका में जायेगा तो वहाँ न्यायाधीश बिका हुआ तैयार मिलेगा जो पैसों वाले के पक्ष में ही फैसला करेगा। फिर तो समाज में अंधेरगर्दी मच जाएगी, पूँजीतंत्र और गुंडावाद हावी हो जाएगा।

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