bihar board class 10 hindi | लौटकर आऊंगा फिर

 bihar board class 10 hindi | लौटकर आऊंगा फिर

bihar board class 10 hindi | लौटकर आऊंगा फिर

लौटकर आऊंगा फिर
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-जीवनानंद दास
*कविता का सारांश:-
‘लौटकर आऊंगा फिर’ बांग्ला साहित्य के चर्चित कवि जीवनानंद दास की बहुप्रचारित और लोकप्रिय कविता है जिसमें उनका मातृभूमि प्रेम और आधुनिक भाव-बोध प्रकट होता है। कवि ने बंगाल के प्राकृतिक सौंदर्य का सम्मोहक चित्र प्रस्तुत करते हुए बंगाल में ही पुन: जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की है।
कवि कहता है कि धान की खेती वाले बंगाल में, बहती नदी के किनारे, मैं एक दिन लॉदूंगा जरूर । हो सकता है, मनुष्य बनकर न लौटू। अबाबील होकर या फिर कौआ होकर, भोर की फूटती किरण के साथ धान के खेतों पर छाए कुहासे में, पेंगें भरतर हुआ कटहल पेड़ की छाया तले जरूर आऊँगा। किसी किशोरी का हंस बनकर, घुघरू-जैसे लाल-लाल पैरों से दिन-दिन भर हरी घास की गंध वाले पानी में, तैरता रहूँगा। बंगाल की मचलती नदियाँ, बंगाल के हरे-हरे मैदान, जिसे नदियाँ धोती बुलाएँगे और मैं आऊँगा, उन्हीं सजल नदियों के तट पर।
हो सकता है, शाम की हवा में किसी उड़ते हुए उल्लू को देखो या फिर कपास के पेड़ से तुम्हें उसकी बोली सुनाई दे। हो सकता है, तुम किसी बालक को घास वाली जमीन पर मुट्ठी भर उबले चावल फेंकते देखो या फिर रूपसा नदी के मटमैले पानी में किसी लड़के को फटे-उड़ते पाल की नाव तेजी से ले जाते देखो या फिर रंगीन बदलों के मध्य उड़ते सारस को देखो, अंधेरे
में मैं उनके बीच ही होऊँगा। तुम देखना, मैं आऊँगा जरूर।
कवि ने बंगाल का जो दृश्य-चित्र इस कविता में उतारा है, वह तो मोहक है ही और गहरी छाप छोड़ता है। इसके साथ ही कवि ने ‘अंधेरे’ में साथ होने के उल्लेख द्वारा कविता को नयी ऊंचाई दी है। यह ‘अंधेरा’ है बंगाल का दुख-दर्द, गरीबी की पीड़ा। इस परिवेश में होने की बात से यह कविता बंगाल के दृश्य-चित्रों, कवि के मातृभूमि प्रेम और मानवीय भाव-बोध की अनूठी
कृति बन गई है।

*सरलार्थ:-
नई कविता काल के प्रखर कवि जीवनानंद दास हिन्दी साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बनाये हुए हैं। रवीन्द्रनाथ के बाद बंगला साहित्य में आधुनिक काव्यांदोलन को जिन लोगों ने योग्य नेतृत्व प्रदान किया था उनमें सबसे अधिक प्रभावशाली एवं मौलिक कवि जीवनानंद दास ही हैं। स्वच्छंदवाद से अलग हटकर कविता की नई यर्थाथवादी भूमि तलाश कर इन्होंने एक नया आयाम दिया।
प्रस्तुत कविता में कवि का अपनी मातृभूमि तथा परिवेश से उत्कट प्रेम अभिव्यक्त होता है। नश्वर शरीर त्यागने के बाद भी पुनः मनुष्य रूप में अवतरित होकर बंगाल से ही अपनी जन्मभूमि चुनने के पीछे कवि की उत्करता देखने में बनती है। कवि का मानना है कि यदि मनुष्य पाग जन्म नहीं लूं तो अबाबील, कौवा, हंस आदि घर में जन्म लेकर भी बंगाल की धरती पर ही विवरण
करूं। नदी को पानी, कपास के पौधे पर सुनाई पड़नेवाली बोली सभी में मेरा ही आग हो । गरी के वक्षस्थल पर तैरती हुई आकाश में रंगनेवाले पक्षिगणों के बीच हमारी उपस्थिति अनिवार्य होगी। वस्तुत: इस कविता में नश्वर जोपन के बाद भी इसी बंगाल में एक बार फिर आने की लालसा मातृभूमि के प्रति कवि के प्रेम की एक मोहक भंगिमा के रूप में सामने आती है।

पद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न

1. खेत हैं जहाँ धान के, बहती नदी
के किनारे फिर आऊंगा लौट कर
एक दिन-बंगाल में; नहीं शायद
होऊँगा मनुष्य तब, होऊंगा अबाबील
या फिर बौवा उस भोर का- फूटेगा नयी
धान की फसल पर जो
कुहरे के पालने से कटहल की छाया तक
भरता पेंग, आऊंगा एक दिन!

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन है ?
उत्तर-जीवनानंद दास ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धत हैं?
उत्तर-लोटकर आऊंगा फिर ।

(iii) कवि कहाँ एक बार फिर लौटकर आने की बात कहता है?
उत्तर-बंगाल में जहाँ नदी के किनारे धान के खेत लहलहा रहे हैं वहाँ पुनः लौटकर आने और मातृभूमि का दर्शन करने की इच्छा कवि प्रकट करता है। वचन देता है।

(iv) कवि क्या बनना चाहता है?
उत्तर कवि कौव के रूप में, अबाबील के रूप में ही सही लेकिन मातृभूमि का, धान की फसलों का, खेतों का, बंगाल की भूमि का दर्शन करना चाहता है। उसकी आकांक्षा है कि एकबार पुनः वह बंगाल की भूमि को देखने आएगा।

(v) ‘फूटेगा नयी धान की फसल पर’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-कवि ने अपनी कविता में नयी धान की फसलों की चर्चा किया है। भोर का भी वर्णन किया है। यहाँ प्रकृति के मनोहर रूपों के बीच नयी धान की फसल की चर्चा करने का मतलब है नयी पीढ़ी से। कवि नयी धान की फसलों की चर्चा तो करता ही है, प्रकारान्तर से वह
नयी पीढ़ी की भी चर्चा करता है। बहुत दिनों के बाद मातृभूमि पर लौटने पर नयी युवा पीढ़ी अपनी तेजस्विता और प्रखरता के साथ दिखेंगी। यहाँ नयी धान की फसलों का प्रयोग कवि ने द्वि-अर्थी

2. बनकर शायद हंस मैं किसी किशोरी का,
घुघरू लाल पैरों में,
तरता रहूँगा बस दिन-दिन भर पानी में-
गंध जहाँ होगी ही भरी, घास की।
आऊँगा मैं। नदियाँ, मैदान बंगाल के बुलाएँगे-
मैं आऊँगा जिसे नदी धोती ही रहती है पानी
से-इसी हरे सजल किनारे पर।

(i) उपर्युक्त पशि के रचनाकार कौन?
उत्तर जीवनानंद दास ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धत है?
उत्तर-लौरकर आऊंगा फिर ।

(iii) कवि क्या बनकर बंगाल भूमि का दर्शन पुनः करना चाहता है?
उत्तर कवि हंस बनकर बंगाल भूमि का पुनः दर्शन करना चाहता है।

(iv) कवि कैसी किशोरी का दर्शन करना चाहता है?
उत्तर-कवि बंगाल भूमि की किशोरी का पुनः दर्शन करना चाहता है। किशोरी के लाल-लाल गुलाबी सदृश पैरों में धुंघरू हाँ, वैसी किशोरी का वह दर्शन करना चाहता है।

(v) कौन पुन: अपने यहाँ कवि को बुलाएंगे?
उत्तर-बंगाल भूमि की नदियाँ, मैदान, वहाँ की मिट्टी की गंध, वहाँ की किशोरियाँ को पुनः बुलाएँगे। उनके पवित्र दर्शन करने के लिए कवि पुन: बंगाल भूमि जाएगा। वह इसका वचन देता है।

3. शायद तुम देखोगे शाम की हवा के साथ उड़ते एक उल्लू को
शायद तुम सुनोगे कपास के पेड़ पर उसकी बोली
घासीली जमीन पर फेंकेगा मुट्ठी भर-भर चावल
शायद कोई बच्चा-उबले हुए!
देखोगे, रूपसा के गंदले-से पानी में
नाव लिए जाते एक लड़के को-उड़ते
फटे पाल की नाव!
लौटते होंगे रंगीन बादलों के बीच, सारस
अँधेरे में होऊँगा मैं उन्हीं के बीच में
देखना!

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-जीवनानंद दास ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-लौटकर आऊँगा फिर ।

(iii) कवि उल्लू को कहाँ देखने की बात कहता है?
उत्तर-कवि बंग भूमि पर शाम के वक्त, हवा के साथ उड़ते हुए उल्लू को देखने की बातें कहता है।

(iv) उल्लू की बोली किस चीज के पेड़ पर सुनायी पड़ती है?
उत्तर-उल्लू की बोली बंग भूमि में उगे कपास के पेड़ पर सुनायी पड़ती है।

(v) नाव खेनेवाले लड़के का वर्णन करें।
उत्तर-एक लड़का रूपसा के गंदले से पानी में उड़ते फटे पाल के सहारे नाव को लं जा रहा है।

बोध और अभ्यास
* कविता के साथ:-
प्रश्न 1. कवि किस तरह के बंगाल में एक दिन लौटकर आने की बात करता है ?
उत्तर-कवि धान से लहलहाते खेत, बहती हुई नदी के किनारे एक दिन लौटकर आने की बात कहता है । कवि भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर भी बंगाल की धरती पर ही आता चाहता है।

प्रश्न 2. कवि अगले जीवन में क्या-क्या बनने की संभावना व्यक्त करता है और क्यों?
उत्तर-कवि अगले जीवन में अबाबील, कौवा, हंस, उल्लू, सारस आदि बनने की संभावना व्यक्त करता है। उसे आशा है कि मनुष्य में जन्म नहीं होने पर संभवतः पक्षियों में इन्हीं रूपों में अवतरित होऊँगा। कवि स्वच्छंद जीवन जीना चाहता है। अतः, पक्षी जीवन को श्रेष्ठ मानता है।

प्रश्न 3. अगले जन्मों में बंगाल में आने की क्या सिर्फ कवि की इच्छा है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-अगले जन्मों में बंगाल में आने की इच्छा सिर्फ कवि में ही है। बंगाल के प्रति कवि का समर्पण उसके बंगाल मोह की उत्कृष्टता झलकती है। बंगाल में जन्म लेकर, अन्य बंगाली कवियों से प्रेरित होकर उसकी सोच भी मातृभूमि के प्रति दृष्टिगोचर होती है।

प्रश्न 4. कवि किनके बीच अँधेरे में होने की बात करता है ? आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-कवि सारसों के बीच अंधेरे में होने की बात कहता है। दिनभर इधर-उधर भटकने वाला सारस संध्या होते ही अपने वासस्थल पर पहुँच जाता है । कवि भी दिनभर इधर-उधर रहना चाहता है। किन्तु संध्या में बंगाल में ही रहना चाहता है।

प्रश्न 5. कविता की चित्रात्मकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-कवि का बंगाल के प्रति समर्पण उसकी मातृप्रेम को सबल कर देता है। मानव के रूप में जन्म नहीं हो ये दु:ख की बात नहीं है किन्तु पक्षीकुल में जन्म लेकर कवि बंगाल को ही सुशोभित करना चाहता है। लहलहाते खेत, बहती हुई नदी आदि । अत: कवि, कवि के अंतर्मन में बसे हुए हैं। लौटकर फिर आऊँगा के विविध भावों में कवि अपने नश्वर शरीर को त्यागने
के उपरांत भी बंगाल की धरती को ही अपना
आधारभूमि बनाना चाहता है। अबाबील, कौवा,
हँस, सारस आदि में जन्म लेकर बंगाल की धरती पर बसना चाहता है।

प्रश्न 6. कविता में आए बिंबों का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-प्रस्तुत कविता में कवि द्वारा विविध रूपों में जन्म लेकर बंगाल की धरती में सुशोभित करने का भाव दृष्टिगोचर होता है। धान की धानी रंग से लहलहाते खेत, पानी से भरी हुई नदियाँ कवि के अंतर्मन को छू लिया है। अतः कवि मनुष्य में जन्म न लेकर पक्षिकुल में जन्म लेना चाहता है। नदी के वक्षस्थल पर तैरनेवाली नौका की पाल बनकर स्वतंत्र रूप से बहना चाहता है । वस्तुतः कवि स्वच्छंदतापूर्ण जीवन को ही अच्छा मानता है । पराधीन भारत की दुर्दशा से कवि का मन विक्षुब्ध है। अतः, वह स्वतंत्रतापूर्ण जीवन को सहज सौम्य रूप में व्यक्त करना चाहता है।

प्रश्न 7. कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-समकालीन कवि जीवनानंद दास ने स्वच्छंद जीवन को उत्तम माना है। ‘लौटकर आऊंगा फिर’ शीर्षक कविता में कवि अपने नश्वर शरीर को त्यागकर भी पुनः जन्म लेना चाहता है। बंगाल के प्रति उसकी उत्कृष्टता देखने में बनती है। बंगाल की जन्मभूमि कमि के हृदय को स्पर्श करते रहती है। उसके अंतर्मन में उठनेवाले मनोभाव सदा व्यथित करते रहते हैं। लहलहाते हुए खेत, स्वच्छंद बहती हुई नदी अनायास आकर्षित करते रहते हैं। अबाबील, कौवा, हंस, सारस
आदि में जन्म लेकर बंगाल की धरती को मुखरित कर देना चाहता है। बंगाल कवि और स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मभूमि है। कवि भी उन्हीं का अंश होना चाहता है। अतः, इनसे स्पष्ट होता है कि प्रस्तुत कविता का शीर्षक सार्थक और समाचीन है।

प्रश्न 8. कवि अगले जन्म में अपने मनुष्य होने में क्यों संदेह करता है ? क्या कारण हो सकता है?
उत्तर-कवि को पुनर्जन्म में मनुष्य होने में संशय होता है। मनुष्य जीवन ईर्ष्या, कटुता, आदि से पूर्ण होता है।
लोगों की मानवता मर गई है । आपसी-विद्वेष से जीवन अधोगति की ओर चला जाता है। पराधीन भारत दुर्दशा से विक्षुब्ध स्वच्छंदतावाद को ही स्थान देता है । अतः, वह पक्षीकुल को उत्तम मानता है।

प्रश्न 9. व्याख्या करें:
(क) “बनकर शायद हँस मैं किसी किशोरी का;
घुघरू लाल पैरों में,
तैरता रहूँगा बस दिन-दिन भर पानी में-
गंध जहाँ होगी ही भरी, घास की।”

(ख) “खेत है जहाँ धान के, बहती नदी
के किनारे फिर आऊँगा लौटकर
एक दिन-बंगाल में।”
उत्तर-(क) प्रस्तुत पंक्तियाँ जीवनानंद दास द्वारा रचित ‘लौटकर आऊँगा फिर’ शीर्षक कविता से संकलित है । इसमें कवि बंगाल के प्रति अपने समर्पण को अभिव्यक्त किया है। नश्वर शरीर को त्यागकर कवि पक्षिकुल में जन्म लेकर बंगाल की धरती को सुशोभित करना चाहता है। हंस बनकर किशोरी के धुंघरू की तरह उन्माद फैलाना चाहता है । वह दिनभर तैरकर सर्वत्र
गंध फैलाना चाहता है। वस्तुतः कवि स्वच्छंद जीवन जीने के लिए प्रेरित है।
(ख) प्रस्तुत पंक्तियाँ जीवनानंद दास द्वारा रचित ‘लौटकर आऊँगा फिर’ शीर्षक कविता
से संकलित है। इसमें कवि बंगाल के प्रति अपने समर्पण को अभिव्यक्त किया है। स्वच्छंदता को आधार बनाकर जीवन जीने की उत्कट अभिलाषा रखनेवाला कवि बंगाल को ही चयन करता है। जन्मभूमि होने के साथ-साथ उससे अपने महापुरुषों की जीवनगाथा झलकती है। वह धान के खेतों, बहती हुई नदियों के किनारे विचरण करना चाहता है । बंगाल के धानी रंग कवि को अनायास आकर्षित कर लेते हैं।

भाषा की बात
प्रश्न 1. निम्नांकित शब्दों के लिंग-परिवर्तन करें। लिंग-परिवर्तन आवश्यकता पड़ने
पर समानार्थी शब्दों का भी प्रयोग करें।
नदी, कौआ, भोर, नयी, हंस, किशोरी, हवा, बच्चा, बादल, सारस ।
उत्तर– नदी — नद
कौआ—कौआई
भोर—-सुबह
नयी —- नया
हंस —- हंसी
किशोरी : — किशोर
हवा — पवन
बच्चा —- बच्ची
बादल:— वर्षा
सारस —-मादा सारस ।

प्रश्न 2. कविता से विशेषण चुनें और उनके लिए स्वतंत्र विशेष्य पद दें।
उत्तर-बहती-नदी, नयी-फसल, गंदा-पानी, फटते-पाल, रंगीन-बादल ।

प्रश्न 3. कविता में प्रयुक्त सर्वनाम चुनें और उनका प्रकार भी बताएँ।
उत्तर-स्वयं करें।

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