आधुनिक भारत के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक - सत्येंद्रनाथ बोस (1894-1974)

 आधुनिक भारत के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक - सत्येंद्रनाथ बोस (1894-1974)

सत्येंद्रनाथ बोस (1894-1974)

1 जनवरी, 1894 को कोलकाता में जन्में सत्येंद्रनाथ बोस को भौतिकी में अपने अमूल्य योगदान के लिये जाना
जाता है। उनके सम्मान में भौतिकी में विशेष प्रकार के कणों को बोसॉन (Boson) कहा जाता है। ये कण भिन्न
होते हुए भी एक ही प्रकार की क्वांटम संख्याएँ (Quantum Numbers) रख सकते हैं। आम भाषा में कहा जाए तो बहुत से बोसॉन एक ही जगह पर रह सकते हैं। (द्रव्यमान कणों में यह संभव नहीं।) बोसॉन कणों का उदाहरण है- प्रकाश कण।

सन् 1924 में उन्होंने 'प्लांक सिद्धांत' पर अपना शोधपत्र 'फिलोसॉफिकल मैगजीन' में प्रकाशन के लिये भेजा जिसे वहाँ के
संपादक मंडल ने अस्वीकृत कर दिया। फिर उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए इस शोधपत्र को आइंस्टीन के पास बर्लिन भेजा, इस अनुरोध के साथ कि वे इस शोधपत्र को पढ़ें और अपनी टिप्पणी दें और यदि वे इसे प्रकाशन योग्य समझें तो जर्मन जर्नल 'Zeitschrift fur Physik' में प्रकाशन की व्यवस्था करें। इस शोधपत्र को आइंस्टीन ने स्वयं जर्मन भाषा में अनूदित किया तथा अपनी टिप्पणी के साथ 'Zeitschrift fur
Physik' में अगस्त 1924 में प्रकाशित करवाया। 
इससे एस.एन. बोस को बहुत प्रसिद्धि मिली और दिन-प्रतिदिन उनकी ख्याति बढ़ती चली गई। कालांतर में दोनों महान वैज्ञानिकों ने अनेक सिद्धांतों पर साथ-साथ कार्य किया। दोनों ने मिलकर क्वांटम फिजिक्स में एक नई शाखा की बुनियाद डाली जिसे आज 'बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी' के नाम से जाना जाता है। 'बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी' के द्वारा सभी प्रकार के बोसॉन कणों के गुणधर्मों का पता लगाया जा सकता है।
विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1954 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया।

बोस आइंस्टीन कंडेंसेट

* NASA के वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में 'पदार्थ की पाँचवी अवस्था' जिसे बोस-आइंस्टीन कंडेंसेट भी कहा जाता है, के साक्ष्य प्राप्त
हुए हैं।

* वैज्ञानिकों द्वारा पदार्थ की इस अवस्था को 'बोस-आइंस्टीन कंडेंसेट' (Bose-Einstein Condensate-BEC) नाम दिया गया है क्योंकि
भारतीय गणितज्ञ सत्येंदनाथ बोस तथा अल्बर्ट आइंस्टीन ने पदार्थ की इस अवस्था के बारे में लगभग एक सदी पहले ही बता दिया था।

* यह क्वांटम ब्रह्मांड (Quantum Universe's) के कुछ सबसे कठिन प्रश्नों को हल करने में मददगार साबित हो सकता है। यह अध्ययन
जर्नल 'नेचर' में प्रकाशित किया गया है।



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