bihar board 12 class history | महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

 bihar board 12 class history | महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

bihar board 12 class history | महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन
 13.                               सविनय अवज्ञा और उससे आगे
        MAHATMA GANDHI AND THE NATIONALIST MOVEMENT
                            (Civil Disobedience and Beyond)
                                       महत्त्वपूर्ण तथ्य एवं घटनाएँ
● 1915 ई. – महात्मा गाँधी का दक्षिण अफ्रीका से आगमन।
● 1917 ई.- चम्पारण आन्दोलन।
● 1918 ई. – खेड़ा (गुजरात) में किसान आन्दोलन तथा अहमदाबाद में मजदूर आन्दोलन।
● 1919 ई. – रॉलेक्ट एक्ट के विरुद्ध आन्दोलन।
● 1921 ई. – असहयोग आन्दोलन और खिलाफत आन्दोलन।
● उदारवादी नेता – गोपालकृष्ण गोखले, मोहम्मद अली जिन्ना।
● उग्रवादी नेता – बाल गंगाधार तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय।
● गांधी जी की पहली सार्वजनिक उपस्थिति – 1916 ई. में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई।
● 1919 ई. – अप्रैल 1919 ई. में जालियाँवाला बाग का हत्याकाण्ड हुआ जिसमें सैकड़ों लोग
मारे गये।
● 1922 ई. – असहयोग आन्दोलन की समाप्ति।
● 1928 ई. – साइमन कमीशन का आगमन।
● 1930 ई. – दाण्डी यात्रा का प्रारंभ।
● गांधी डूर्विन समझौता – इसकी शर्तों में सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस लेना, सभी कैदियों
की रिहाई और तटीय इलाकों में नमक उत्पादन की अनुमति देना शामिल था।
● स्वराज्यवादी – इस विचारधारा के प्रमुख नेता श्री चितरंजनदास, श्री मोतीलाल नेहरू और
वी. जी. पटेल थे। उन्होंने कांग्रेस से अलग अपना समूह बनाया।
● प्रथम गोलमेज सम्मेलन – नवम्बर 1930 में आयोजित किया गया।
● द्वितीय गोलमेज सम्मेलन – 1931 ई. में आयोजित हुआ।
● 1935 ई.- गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट पास हुआ।
● पाकिस्तान स्थापना का प्रस्ताव – इस प्रस्ताव को मार्च 1940 में मुस्लिम लीग ने उठाया।
● क्रिप्स मिशन – 1942 ई. में भारत आया था परन्तु वह विफल हुआ।
● फरवरी 1947 ई. – वावेल की जगह लार्ड माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया।
                 एन.सी.आर.टी. पाठ्यपुस्तक एवं कुछ अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
 (NCERT Textbook & Some Other Important Questions for Examination)
                                                 बहुविकल्पीयय प्रश्न
                                    (Multiple Choice Questions)
1. खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे :
(क) गाँधी जी और नेहरू
(ख) शौकत अली और मुहम्मद अली
(ग) मोहम्मद अली जिन्ना
(घ) इनमें से कोई नहीं                                   उत्तर-(ख)
2. ‘काला विधेयक’ किसे कहा जाता है? [B.M.2009A, B.Exam.2013(A)]
(क) रॉलेक्ट एक्ट
(ख) इलबर्ट बिल
(ग) शिक्षा बिल
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं                          उत्तर-(क)
3. स्वराज्य दल का संस्थापक कौन था ?
(क) मोहनदास करमचंद गाँधी
(ख) चितरंजन दास
(ग) बाल गंगाधर तिलक
(घ) पंडित जवाहर लाल नेहरू                      उत्तर-(ख)
4. साइमन कमीशन का भारतीयों द्वारा विरोध क्यों किया गया ?
(क) आयोग में एक भी भारतीय सदस्य न होने के कारण
(ख) आयोग द्वारा अत्याचार करने के कारण
(ग) आयोग में अधिक सदस्य होने के कारण
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं                            उत्तर-(क)
5. ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ किसका कथन था :
(क) भगतसिंह
(ख) रासबिहारी बोस
(ग) मोहनसिंह
(घ) सुभाषचंद्र बोस                                      उत्तर-(घ)
6. सुभाषचंद्र बोस किस अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे ?
(क) नागपुर
(ख) लाहौर
(ग) हरिपुरा
(घ) कलकत्ता                                             उत्तर-(ग)
7. लाल कुर्ती का नेतृत्व किसने किया था ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) अब्दुल गफ्फार खां
(ग) पंडित नेहरू
(घ) मौलाना आजाद                                    उत्तर-(ख)
8. महात्मा गाँधी को सर्वप्रथम ‘महात्मा’ किसने कहा:
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) पं. जवाहरलाल नेहरू
(ग) बाल गंगाधर तिलक
(घ) इनमें से कोई नहीं                                    उत्तर-(क)
9. इनमें से कौन दलित राजनीति के प्रतीक बन गए थे ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) डॉ. भीमराव अंबेडकर
(ग) लाल लाजपत राय
(घ) सरदार पटेल                                           उत्तर-(ख)
10. ‘मेरे शरीर पर लगी एक-एक चोट ब्रिटिश राज्य के लिए ताबूत की कील साबित ..
होगी।’ उक्त कथन किस राष्ट्रवादी नेता का है:
(क) महात्मा गाँधी
(ख) पं. जवाहर लाल नेहरू
(ग) लाला लाजपत राय
(घ) बाल गंगाधर तिलक                                   उत्तर-(ग)
11. महात्मा गाँधी ने किसके विषय में निम्न शब्द कहे थे-‘असफल हो रहे बैंक का
अग्निमतिथीय चेक’:
(क) क्रिप्स प्रस्ताव
(ख) सी. आर. प्रस्ताव
(ग) वेवल प्रस्ताव
(घ) कैबिनेट मिशन प्रस्ताव                               उत्तर-(क)
12. अखिल भारतीय किसान सभा का पहला अधिवेशन कहाँ हुआ था ?
(क) फैजाबाद
(ख) लखनऊ
(ग) दिल्ली
(घ) सूरत                                                       उत्तर-(क)
13. 1929 ई. में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष थे:
(क) पं. जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) मौलाना आजाद
(घ) सुभाषचन्द्र बोस                                 उत्तर-(क)
14. भारत राष्ट्र का पिता माना गया है :
(क) गोपालकृष्ण गोखले को
(ख) राजा राम मोहनराय को
(ग) मोहनदास करमचंद गाँधी को
(घ) मदन मोहन मालवीय को                        उत्तर-(ग)
15. गाँधीजी ने विख्यात नमक यात्रा शुरू की थी :
(क) मार्च, 1930 में
(ख) मई, 1930 में
(ग) मार्च, 1932 में
(घ) मई, 1934 में                                      उत्तर-(क)
16. मोहनदास करमचंद गाँधी को ‘महात्मा’ बनाया था:
(क) पूर्वी अफ्रीका ने
(ख) पश्चिमी अफ्रीका ने
(ग) दक्षिण अफ्रीका ने
(घ) उत्तरी अफ्रीका ने                                  उत्तर-(ग)
17. गाँधीजी किसे अपना राजनीतिक गुरु मानते थे ?
(क) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को
(ख) दादाभाई नौरोजी को
(ग) गोपालकृष्ण गोखले को
(घ) लाला लाजपतराय को                            उत्तर-(ग)
18. अमृतसर में जनसंहार हुआ था :
(क) अप्रैल, 1919 में
(ख) फरवरी, 1909 में
(ग) मार्च, 1929 में
(घ) जनवरी, 1919 में                                  उत्तर-(क)
19. मुहम्मद अली और शौकत अली परस्पर थे:
(क) भाई-भाई
(ख) पिता-पुत्र
(ग) मित्र
(घ) चाचा-भतीजा                                         उत्तर-(क)
20. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1921 में कुल हड़ताले हुई थीं:
(क)396
(ख) 496
(ग) 996
(घ) 196                                                      उत्तर-(क)
21. दूसरा गोलमेज सम्मेलन लंदन में आयोजित हुआ था :
(क) 1934 में
(ख) 1931 में
(ग) 1935 में
(घ) 1921 में                                                  उत्तर-(ख)
22. 1937 में कितने प्रांतों में विधायी सभाओं का चुनाव हुआ?
(क) 11
(ख) 15
(ग) 556
(घ) 325                                                       उत्तर-(क)
23. भारत छोड़ो आंदोलन हुआ था :
(क) अगस्त, 1942 में
(ख) अगस्त, 1940 में
(ग) अगस्त, 1944 में
(घ) इनमें से कोई नहीं                                      उत्तर-(क)
24. गाँधी जी का निधन हुआ था :
(क) 30 जनवरी, 1948
(ख) 30 जनवरी, 1947
(ग) 25 जनवरी, 1949
(घ) 15 जनवरी, 1950                                   उत्तर-(क)
25.बंग-भंग आंदोलन का आरंभ हुआ ?                       [B.M.2009A]
(क) 1885
(ख) 1895
(ग) 1900
(घ) 1905                                                    उत्तर-(घ)
26. मुस्लिम लीग की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
                                  [B.Exam./B.M.2009(A), B.Exam 2013(A)]
(क) 1902
(ख) 1906
(ग) 1946
(घ) 1948                                               उत्तर-(ख)
27. देश के किसानों ने विद्यार्थी और मजदूरों के साथ मिलकर किस आंदोलन में प्रमुख
रूप से भाग लिया-                                        [B.M.2009A]
(क) असहयोग आंदोलन
(ख) खिलाफत आंदोलन
(ग) स्वेदशी आंदोलन
(घ) भारत छोड़ो आंदोलन                             उत्तर-(घ)
28. मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किस समाचार पत्र का प्रकाशन किया-
                                      [B.Exam./B.M.2009A,B.Exam.2012 (A)]
(क) कामरेड
(ख) अलहिलाल
(ग) न्यू इंडिया
(घ) यंग इंडिया                                           उत्तर-(ख)
29. हैदराबाद का भारत में विलय कब हुआ ?                  [B.M.2009A]
(क) 1948
(ख) 1949
(ग) 1950
(घ) 1951                                                उत्तर-(क)
30. गाँधी जी ने सत्याग्रह का पहला प्रयोग कहाँ किया ? [B.M.2009A]
(क) चंपारण में
(ख) अहमदाबाद में
(ग) खेरा में
(घ) मद्रास में                                            उत्तर-(क)
31. सविनय अवज्ञा आंदोलन में गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ा- [B.M.2009A]
(क) 6 अप्रैल, 1930 को
(ख) 13 अप्रैल, 1930 को
(ग) 25 अप्रैल, 1930 को
(घ) 30 अप्रैल, 1930 को                            उत्तर-(क)
32. ‘करो या मरो’ किस आंदोलन का नारा था-                   [B.M.2009]
(क) असहयोग आंदोलन का
(ख) सविनय अवज्ञा आंदोलन का
(ग) भारत छोड़ो आन्दोलन का
(घ) किसी का नहीं                                       उत्तर-(ग)
33. पूर्ण स्वराज्य की घोषणा-कहाँ हुई ?                         [B.M.2009A]
(क) लाहौर में
(ख) भोपाल में
(ग) बंबई में
(घ) कोलकाता में                                           उत्तर-(क)
34. ‘तुम मुझे खून दो मैं तुझे आजादी दंगा’ किसने कहा था? [B.M.2009A]
(क) तेज बहादुर सप्तू का
(ख) सुभाष चन्द्र बोस का
(ग) मोतीलाल नेहरू ने
(घ) भगत सिंह ने                                          उत्तर-(ख)
35. महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु थे ?                      [B.M.2009A]
(क) लाजपत राय
(ख) फिरोजशाह
(ग) गोखले
(घ) दादा भाई नौरोजी                                    उत्तर-(ग)
36. ‘दिल्ली चलो’ का नारा किसने दिया था ?
                                                 [B.Exam./B.M.2009A, B.Exam.2013 (A)]
(क) गाँधी जी
(ख) सुभाष चन्द्र बोस
(ग) तिलक
(घ) नेहरू                                                     उत्तर-(ख)
37. डांडी यात्रा के दौरान किस कानून को तोड़ा गया ? [B.M.2009A]
(क) चीनी कानून
(ख) प्रेस कानून
(ग) नमक कानून
(घ) शस्त्र कानून                                      उत्तर-(ग)
38. 1942 ई० में किस आंदोलन का आरंभ हुआ ?
                                                 [B.Exam./B.M.2009A,B.Exam.2013 (A)]
(क) असहयोग
(ख) सविनय अवज्ञा
(ग) चम्पारण
(घ) भारत छोड़ो                                         उत्तर-(घ)
39. गाँधी जी ने नमक कानून किस वर्ष भंग किया था ? [B.M.2009A]
(क)  1917 ई०
(ख) 1920 ई०
(ग) 1930 ई०
(घ) 1942 ई०                                             उत्तर-(ग)
40. जालियांवाला बाग हत्याकांड किस वर्ष हुआ ?
                                                   [B.Exam/B.M.2009A,B.Exam.2012(A)]
(क) 1919 ई०
(ख) 1920 ई०
(ग) 1921 ई०
(घ) 1922 ई०                                            उत्तर-(क)
41. ‘डांडी’ कहाँ स्थित है ? [B.Exam/B.M.2009A,B.Exam.2013 (A)]
(क) बिहार
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) महाराष्ट्र
(घ) गुजरात                                                उत्तर-(घ)
42. दक्षिण अफ्रीका से भारत स्थायी रूप से गाँधी जी कब लौटे ? [B.M. 2009A]
(क) 1911
(ख) 1913
(ग) 1915
(घ) 1919                                                उत्तर-(ग)
43. 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की थी?[B.M.2009A]
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) मोतीलाल नेहरू
(ग) राजेन्द्र प्रसाद
(घ) वल्लभ भाई पटेल                                 उत्तर-(क)
44. डांडी यात्रा कब आयोजित की गई ?                      [B.M.2009A]
(क) 1930
(ख) 1931
(ग) 1932
(घ) 1933                                                   उत्तर-(क)
45. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन किस वर्ष हुआ था ?                [B.M.2009A]
(क) 1930
(ख) 1931
(ग) 1932
(घ) 1933                                                 उत्तर-(ख)
46. भारत में कैबिनेट मिशन कब आया था ?                      [B.M.2009A]
(क) 1946
(ख) 1947
(ग) 1948
(घ) 1949                                                   उत्तर-(क)
47. सहायक संधि की नीति कार्यान्वित की-                  [B.Exam.2009A]
(क) बेंटिकने
(ख) कार्नवालिस ने
(ग) वेलेस्लीनेर
(घ) डलहौजी                                               उत्तर-(क)
48. गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन किस वर्ष आरंभ किया ? [B.Exam. 2010 (A)]
(क) 1920
(ख) 1922
(ग) 1930
(घ) 1942                                                    उत्तर-(क)
49. इण्डियन नेशनल आर्मी का गठन किसने किया ?            [B.Exam.2010 (A)]
(क) भगत सिंह
(ख) चन्द्रशेखर आजाद
(ग) सुभाष चन्द्र बोस
(घ) गाँधीजी                                        उत्तर-(ग)
50. जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने।          [B.Exam.2011 (A)]
(क) 1946
(ख) 1947
(ग) 1948
(घ) 1949                                         उत्तर-(ख)
51. स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जेनरल कौन थे?         [B.Exam.2012(A)]
(क) सी. राजगोपालाचारी
(ख) लार्ड माउण्ट बेटन
(ग) लाल बहादुर शास्त्री
(घ) रेडक्लिफ                                    उत्तर-(क)
52. 1920 ई० में कौन आंदोलन हुआ ?                       [B.Exam.2013(A)]
(क) खिलाफत
(ख) असहयोग
(ग) भारत छोड़ो
(घ) सविनय अवज्ञा                              उत्तर-(घ)
                                             अति लघु उत्तरीय प्रश्न
                            (Very Short Answer Type Questions)
प्रश्न 1. दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी की दो उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर-(i) दक्षिण अफ्रीका में ही महात्मा गाँधी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह के रूप में प्रचलित
अहिंसात्मक विरोध की अपनी विशिष्ट तकनीक का इस्तेमाल किया।
(ii) वहाँ उन्होंने विभिन्न धर्मों के बीच सौहाई बढ़ाने का प्रयास किया तथा उच्च जातीय
भारतीयों को निम्न जातियों और महिलाओं के प्रति भेदभाव वाले व्यवहार न करने के लिए चेताया।
प्रश्न 2. 1905-07 के स्वदेशी आन्दोलन के तीन प्रमुख नेताओं के नाम बताइए।
उत्तर-(i) महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक।
(ii) बंगाल के विपिन चन्द्रपाल।
(iii) पंजाब के लाला लाजपत राय।
प्रश्न 3. असहयोग आन्दोलन के शुरू होने के मुख्य कारण लिखो।
उत्तर-गाँधी जी ने 1920 ई. में असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया। इसके निम्नलिखित
कारण थे-
(i) रॉलेक्ट एक्ट : प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 ई. में रॉलेक्ट एक्ट पास किया गया।
इसके द्वारा सरकार अकारण ही किसी व्यक्ति को बन्दी बना सकती थी। इससे असंतुष्ट होकर
महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन चलाया।
(ii) जालियाँवाला बाग की दुर्घटना : रॉलेक्ट एक्ट का विरोध करने के लिए अमृतसर
में जालियाँवाला बाग के स्थान पर एक जनसमा बुलायी गई। जनरल डायर ने इस सभा में एकत्रित लोगों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलायीं। भयंकर हत्याकाण्ड हुआ। महात्मा गाँधी ने इस हिंसात्मक घटना से दुःखी होकर असहयोग आन्दोलन आरंभ कर दिया।
प्रश्न 4. रॉलेक्ट एक्ट के प्रावधान बताइए।
उत्तर-(i) ब्रिटिश सरकार द्वारा रॉलेक्ट एक्ट 1919 में पारित किया गया। इस अधिनियम
के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को किसी भी समय गिरफ्तार किया जा सकता था।
(ii) वस्तुतः यह अधिनियम भारतीयों के किसी भी आन्दोलन को रोकने के लिए पास किया
गया। फलस्वरूप गाँधीजी सहित अन्य नेताओं में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।
प्रश्न 5. गांधी जी ने चम्पारन सत्याग्रह क्यों शुरू किया ?
उत्तर-(i) चम्पारन (बिहार) में यूरोपीय निलहे यहाँ के किसानों से नील की खेती कराते
थे और उनके ऊपर अनेक प्रकार के अत्याचार करते थे। उन्हें अपने उत्पादन का उचित मूल्य
नहीं मिलता था।
(ii) महात्मा गांधी अफ्रीका के अपने आन्दोलन के अनुभव को चम्पारन में दोहराना चाहते
थे। इसलिए वहाँ के किसानों को सहायता करने का आश्वासन दिया।
प्रश्न 6. 1919 ई. में भारत सरकार अधिनियम की दो प्रमुख धारायें क्या थीं?
उत्तर-(i) इसके अंतर्गत विधान परिषदों का आकार बढ़ाया गया और निर्वाचन की व्यवस्था
की गई।
(ii) प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली लागू की गई और प्रांतीय सरकारों को अधिक अधिकार
दिये गये।
प्रश्न 7. खिलाफत आन्दोलन की असहयोग आन्दोलन में क्या भूमिका थी?
उत्तर-(i) खिलाफत आन्दोलन के नगरों में मुसलमान राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने लगे।
(ii) मुसलमानों ने 1920 ई. में खिलाफत आन्दोलन चलाकर भारतीयों में राष्ट्रवादी भावनाओं
का संचार किया।
प्रश्न 8. बारदोली आन्दोलन का क्या महत्व था ?
उत्तर-बारदोली में हुई कांग्रेस की कार्य समिति के पारित प्रस्ताव में मजदूरों और किसानों
के आन्दोलन को राष्ट्रीय आन्दोलन का अंग माना गया तथा उनके आर्थिक और सामाजिक उत्थान के उद्देश्य पर विचार किया गया।
प्रश्न 9. 26 जनवरी, 1930 ई. को जनता द्वारा ली गई स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा के दो
मुख्य पहलु लिखिए।
उत्तर-(i) प्रथम राजनीतिक पहलू था – “हम यह विश्वास करते हैं कि यदि कोई सरकार
लोगों को उनके अधिकारों से वंचित रखती है और उनको दबाती है तो लोगों को भी यह अधिकार है कि वे उसे बदल दें या उसे समाप्त कर दें।”
(ii) द्वितीय आर्थिक पहलू था- “भारत को आर्थिक दृष्टि से बर्बाद कर दिया गया है। हम
लोगों से जितना धन एकत्र किया जाता है यह उनकी आय के अनुपात में बहुत अधिक है….
….यदि हम ऐसी सरकार के सामने झुकें जिसने चारों खाने हमारे देश की बर्बादी कर दी हो।”
प्रश्न 10. भारतीय राजनीति पर जालियाँवाला बाग के हत्याकांड का क्या प्रभाव
पड़ा?
उत्तर-1. इस हत्याकांड में जो अनेक निहत्थे भारतीय मारे गए उससे भारतीयों को अंग्रेजी
शासन पर बिल्कुल विश्वास न रहा।
2. 1919 ई. के बाद भारतीय राजनीति ने और उग्र रूप धारण कर लिया और क्रांतिकारी
युद्ध का आरंभ हुआ। लोगों के मन में प्रतिशोध की भावना जाग उठी।
प्रश्न 11. खिलाफत आंदोलन क्या था?                                 [B.M.2009A]
उत्तर-खिलाफत आंदोलन (1919-1920): खिलाफत आन्दोलन मुहम्मद अली और
शौकत अली के नेतृत्व में भारतीय मुसलमानों के बीच का व्यापक आंदोलन था। इस आंदोलन की निम्नलिखित माँगें थीं:
1. पहले के ऑटोमन साम्राज्य के सभी इस्लामी पवित्र स्थानों पर तुर्की सुल्तान अथवा खलीफा का नियंत्रण बना रहे।
2. जजीरात-उल-अरब (अरब, सीरिया, इराक, फिलीस्तीन) इस्लामी संप्रभुता के अधीन रहे
तथा खलीफा के पास इतने क्षेत्र हों कि वह इस्लामी विश्वास को सुरक्षित करने के योग्य बन सके।
कांग्रेस ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और गाँधीजी ने इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता
कायम रखने के लिए असहयोग आंदोलन के साथ मिलाने की कोशिश की।
प्रश्न 12. गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन आरम्भ करने के दो प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर-1. पंजाब में हुए जालियाँवालाबाग हत्या कांड एवं अत्याचारों की अंग्रेजों द्वारा भरपाई
न करना।
2. तुर्की के सुल्तान या खलीफा से सम्बन्धित अन्याय तथा अत्याचारों की ब्रिटिश सरकार
द्वारा अनदेखी करना।
3. स्वराज्य प्राप्त करना।
4. हिन्दू-मुस्लिम एकता को और मजबूत करना।
प्रश्न 13. 1920 के असहयोग आन्दोलन के दो प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया। वह गाँव-गाँव तथा
जनसाधारण तक फैल गया।
2. इस आन्दोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता को बल मिला।
प्रश्न 14. गाँधीजी ने 1922 ई. में असहयोग आन्दोलन क्यों वापस लिया ?
उत्तर-1. 1922 ई. में चौरी-चौरा नामक स्थान पर जब निहत्थी भीड़ पर पुलिस ने लाठीचार्ज
किया, तो क्रुद्ध भीड़ ने थाने में आग लगा दी और उसमें 22 जिंदा सिपाहियों को जला डाला।
2. गाँधीजी ने आंदोलन का हिंसक रूप देखा तो उन्हें बड़ी निराशा हुई। अतः दुःखी हृदय
से उन्होंने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
प्रश्न 15. असहयोग आंदोलन में खिलाफत आंदोलन का क्या महत्वपूर्ण योगदान था ?
उत्तर-1. इसके द्वारा शहरों में रहनेवाले मुसलमान राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए।
2. मुसलमानों ने 1920 ई. में खिलाफत आन्दोलन चला कर लोगों में राष्ट्रवादी भावनाओं
का संचार किया।
प्रश्न 16. बारदोली में हुई कांग्रेस की कार्यसमिति में पारित प्रस्ताव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-बारदौली में हुई कांग्रेस की कार्यसमिति में पारित प्रस्ताव में मजदूरों और किसानों के
आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन का अंग माना गया तथा उनके आर्थिक और सामाजिक उत्थान
के उद्देश्य को समझा गया।
प्रश्न 17. बारदोली में कांग्रेस पार्टी ने क्या ऐतिहासिक निर्णय (1992) लिए? इस
निर्णय के पीछे क्या कारण नियत थे?
उत्तर-गुजरात में बारदोली के स्थान पर हुई कांग्रेस की कार्य समिति ने सरकार के विरुद्ध
सत्याग्रह आंदोलन चलाने की सोची क्योंकि वहाँ किसानों या बटाईदारों की दशा बहुत खराब थी।
वे लगान में कमी, बेदखली से सुरक्षा और कर्जे से राहत चाहते थे। क्योंकि; अंग्रेजी सरकार उनकी माँगों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही थी इसलिए 1928 ई. में सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में किसानों ने टैक्स न देने का आन्दोलन चलाया। अन्त में वे अपनी माँगे मनवाने में सफल हुए।
प्रश्न 18. महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुए भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दो प्रमुख पक्षों
की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-1. गाँधीजी ने सत्याग्रह की नई विधि को चलाया जिसका आधार सत्य और अहिंसा था।
2. उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन का रूप दिया जिसमें किसान, मजदूर, स्त्रियाँ,
उच्च एवं निम्न वर्ग के लोग शामिल थे।
प्रश्न 19. राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास के संदर्भ में अपरिवर्तशील (Non-
Changers) शब्द किसके लिए है ?
उत्तर-1. 1922 ई. में असहयोग आंदोलन गाँधीजी द्वारा वापस लिए जाने के बाद, जिन लोगों
ने स्वराजवादियों का साथ नहीं दिया, उन्हें ‘अपरिवर्तनवादी’ कहा जाने लगा।
2. उन लोगों में से प्रमुख थे-सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. अंसारी और बाबू राजेन्द्र प्रसाद।
प्रश्न 20. कब और क्यों स्वराज दल का गठन हुआ?
उत्तर-1. सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने दिसम्बर 1922 में स्वराज दल की
स्थापना की।
2. गाँधीजी ने जब चौरी-चौरा कांड के बाद असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया, तो इससे
रुष्ट होकर चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने ऐसा किया।
प्रश्न 21. 1920 ई. के बाद क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण में जो परिवर्तन आया, उसके
दो परिणाम लिखें।
उत्तर-1. 1925 ई. में काकोरी (उ. प्र.) स्टेशन पर गाड़ी से जा रहे सरकारी खजाने को
क्रांतिकारियों ने लूट लिया। इस धन को वे बम और हथियार खरीदने में लगाना चाहते थे।
2. साईमन कमीशन का बहिष्कार करने के उद्देश्य से लाहौर में जब लाला लाजपत राय के
नेतृत्व में विरोध जुलूस निकाला गया, तो उस पर भीषण लाठी प्रहार हुआ। लाला जी बुरी तरह
घायल हो गये और बाद में इसी कारण उनकी मृत्यु हो गई। दिसंबर, 1929 ई. में दोषी पुलिस
अधिकारी सांडर्स को क्रांतिकारियों ने गोलियों से छलनी कर दिया।
प्रश्न 22. काकोरी षड्यंत्र कांड क्या था?
उत्तर-1. राजकीय कोष को चलती गाड़ी से लूटने के क्रम में ब्रिटिश सरकार ने काकोरी
रेलवे स्टेशन पर 1925 ई. में कुछ क्रांतिकारियों को कैद करके उन पर मुकदमा चलाया।
2. सत्रह लोगों को जेल की लम्बी सजा मिली, चार को आजीवन कारावास तथा राम प्रसाद
बिस्मिल और अशफाकुल्ला सहित चार लोगों को फाँसी हुई।
प्रश्न 23. भगत सिंह के समाजवादी विचारों के विषय में दो बिन्दु दीजिए।
उत्तर-1. भगत सिंह को समाजवाद में यकीन था। उन्होंने लिखा था कि “किसानों को केवल
विदेशी शासन ही नहीं वरन् जमींदारों तथा पूँजीपतियों के जुर्म से भी मुक्त कराना होगा।”
2. भगत सिंह ने समाजवाद की वैज्ञानिक परिभाषा देते हुए कहा था कि इसका अर्थ ‘पूँजीवाद
तथा वर्गीय शासन का अंत करना है।’
प्रश्न 24. “भगत सिंह पूरी तरह और चेतन रूप से धर्म निरपेक्ष थे।” दो बिंदु दीजिए।
उत्तर-1. भगत सिंह के अनुसार सांप्रदायिकता भी उपनिवेशवाद की तरह बहुत बड़ा मानवीय
शत्रु है।
2. 1926 में भगत सिंह ने पंजाब में नौजवान भारतसभा की स्थापना में भाग लिया। सभा
के नियमों में कहा गया कि सांप्रदायिक विचार फैलाने वाले संगठनों तथा दलों से संबंध न रखा जाए। धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है।
प्रश्न 25. राष्ट्रीय आंदोलन में राजघरानों (Princely States) के लोगों को क्यों शामिल
किया गया?
उत्तर-1. राष्ट्रीय आंदोलन में देशी राज्यों की प्रजा को इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि
लगभग 563 राज्यों के बिना भारत अधूरा था।
2. कांग्रेस राजघरानों को देश का अभिन्न अंग मानती थी।
प्रश्न 26. कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन का महत्वपूर्ण पक्ष क्या था ?
उत्तर-1. इससे नई उग्रवादी विचारधारा को बल मिला।
2. “पूर्ण स्वराज्य” प्राप्ति के लिए कांग्रेस कटिबद्ध हुई।
3. नागरिक अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया गया।
4. पहले स्वतंत्रता दिवस को 26 जनवरी, 1930 ई. में लाहौर के रावी तट पर झंडा फहराकर
मनाया गया।
प्रश्न 27. 1931 के गाँधी-इरविन समझौते का क्या परिणाम निकला ?
उत्तर-1. यद्यपि गाँधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गए थे। जनवरी, 1932 ई.
को गाँधीजी तथा अन्य नेताओं को बंदी बना लिया गया।
2. कांग्रेस को पुनः गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
3. एक लाख से अधिक सत्याग्रही बंदी बना लिए गये।
4. हजारों प्रदर्शनकारियों की भूमि, मकान तथा संपत्ति सरकार ने जब्त कर ली।
प्रश्न 28. कांग्रेस के मंत्रिमंडलों ने 1935 के अधिनियम में दी गई शक्तियों का प्रयोग
करके किन प्रान्तों में जनता की दशा में सुधार किया ?
उत्तर-1935 के अधिनियम के अनुसार जब दो वर्ष पश्चात् अर्थात् 1937 ई. में भारत में
चुनाव हुए तो कांग्रेस को ग्यारह में से सात प्रान्तों में बहुमत प्राप्त हुआ। इसलिए कांग्रेस के
मंत्रिमंडलों ने निम्नलिखित सात प्रान्तों की जनता की दशा में सुधार किया-
1. संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश), 2. मध्य प्रान्त (या आधुनिक मध्य प्रदेश), 3. बिहार, 4.
उड़ीसा, 5. असम, 6. बम्बई और 7. मद्रास।
अन्य दो प्रान्तों सिंध और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में उसने मिली-जुली सरकार का निर्माण
किया इसलिए आंशिक रूप में वहाँ के लोगों का भी उद्धार हो सका।
केवल पंजाब और बंगाल में ही मुस्लिम लीग और उसके साथियों की सरकार बन सकी थी।
प्रश्न 29. इंडियन नेशनल कांग्रेस ने प्रथम राष्ट्रीय योजना समिति कब और क्यों
बनाई?
उत्तर-1. 1933 ई. में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने प्रथम राष्ट्रीय योजना समिति बनाई।
2. इसका उद्देश्य देश में आर्थिक योजना को लागू करना था जिससे कि धन का
विकेन्द्रीकरण किया जा सके तथा बड़े उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाया जा सके।
प्रश्न 30. भारत छोड़ो आन्दोलन कब और किसने चलाया ?
उत्तर-1942 ई. में गाँधीजी ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया। वे चाहते थे कि अंग्रेज भारत
छोड़ कर सदा के लिए चले जायें। हमको उनके संवैधानिक सुधारों या अन्य किसी चीज की
जरूरत नहीं है। अतः 1942 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध स्थान-स्थान पर उग्र प्रदर्शन होने लगे।
ज्यों-ज्यों सरकार का दमन-चक्र तेज चलता जाता, त्यों-त्यों निहत्थी जनता में प्रतिशोध की भावना बढ़ती गई।
प्रश्न 31. भारत छोड़ो आन्दोलन के महत्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा, भारत छोड़ो आन्दोलन की व्याख्या करें। [B.Exam.2011,2013(A)]
उत्तर-1942 ई. में गाँधीजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया गया। गाँधीजी ने
‘करो या मरो’ का नारा दिया। आन्दोलन की पूर्व संध्या पर ही प्रमुख नेताओं को जेलों में डाल
दिया गया। इससे जनता भड़क उठी और उसने रेलवे स्टेशनों, डाकघरों, थानों तथा सरकारी भवनों को जलाना शुरू कर दिया। टेलीफोन के तार काट डाले और रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गई। अंग्रेजों ने इस जन आन्दोलन को दबाने के लिए लाठी, गोली आदि का सहारा लिया। हजारों
प्रदर्शनकारियों को जेलों में ठूँस दिया गया। जनता नेतृत्वहीन और दिशाभ्रमित थी। अतः सब
अपने-अपने ढंग से सरकार का प्रतिरोध कर रहे थे।
प्रश्न 32. ‘खुदाई खिदमतगार आंदोलन’ कहाँ और क्यों चलाया जा रहा था ? इसके
प्रमुख नेता कौन थे?
उत्तर-1. ‘खुदाई खिदमतगार आंदोलन’ पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में किसानों द्वारा सरकार की
मालगुजारी नीति के खिलाफ चलाया जा रहा था।
2. इस आंदोलन के प्रमुख नेता खान अब्दुल गफ्फार खान थे।
प्रश्न 33. 1945-46 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता के लिए जन आंदोलन के दो
उदाहरण दीजिए।
उत्तर-1. आर्थिक शोषण और निरंतर अपमान सहते-सहते प्रत्येक स्तर पर भारतीय बौखला
गये थे।
2. चाहे किसान हो या जमींदार, सिपाही हो या जनसाधारण, सबके प्रति अंग्रेजों के
अपमानपूर्ण रवैये के बदले में जो लावा दबा हुआ था उसे एक न एक दिन फूटना ही था।
प्रश्न 34. वेवल योजना कब और क्यों बनाई गई थी?
उत्तर-वेवल योजना 14 जून, 1945 को लार्ड वेवल द्वारा बनाई गई। इसका उद्देश्य भारत
में व्याप्त जनाक्रोश को कम करना था।
प्रश्न 35. शिमला कांफ्रेंस कब और कहाँ पर हुई थी ? इसके उद्देश्य क्या थे?
उत्तर-शिमला कांफ्रेंस 25 -जून, 1945 को शिमला में हुई थी। इसका उद्देश्य स्वच्छ
राजनीतिक वातावरण बनाने के लिए सभी दलों के नेताओं को एकमत करना था।
प्रश्न 36. कैबिनेट मिशन योजना के कौन-कौन से सदस्य ?
उत्तर-कैबिनेट मिशन योजना के तीन सदस्य थे-पैथिक, लारेंस, सर स्टीफोर्ड क्रिप्स और
ए, बी. एलेक्जैंडर।
प्रश्न 37. कैबिनेट मिशन योजना क्या थी?
उत्तर-कैबिनेट मिशन 24 मार्च, 1946 को दिल्ली पहुंँचा। इस मिशन ने 182 बैठकें और
भारत के 742 नेताओं के साथ बातचीत की।
प्रश्न 38. 1946 ई. में कैबिनेट मिशन जो भारत आया उसकी दो मुख्य सिफारिशें क्या थीं?
उत्तर-1. भारतीय रियासतों और प्रान्तों का एक सांझा संघ बनाया जाये।
2. भारत का संविधान तैयार करने के लिए एक योजना बनाई गई और एक संविधान सभा का निर्माण करने को कहा गया था।
प्रश्न 39. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार 2 सितंबर, 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरू
के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इसमें 14 सदस्य थे-6 कांग्रेसी, 5 मुस्लिम
लीग, एक भारतीय ईसाई, एक सिक्ख और एक पारसी थे।
प्रश्न 40. ‘गाँधीजी के प्रारंभिक जीवन एवं दक्षिण अफ्रीका में उनके कार्यकलाप’
विषय का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. सन् 1915 से पूर्व लगभग 20 वर्षों के लिए मोहनदास करमचंद गाँधी विदेशों में
रहे थे, इसमें ज्यादातर समय उनका दक्षिण अफ्रीका में बीता था।
2. गाँधीजी एक वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए थे और कालान्तर में इस क्षेत्र में
भारतीय समुदाय के नेता बन गए।
3. गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में पहली बार वहाँ की सरकार की रंग भेदभाव, जातीय
भेदभाव के विरुद्ध सत्याग्रह के रूप में अपना अहिंसात्मक तरीके से विरोध किया तथा विभिन्न
धर्मों के मध्य सौहार्द्र बढ़ाने की कोशिश की। गाँधीजी ने उच्च जातीय भारतीयों से निम्न जातियों
एवं महिलाओं के प्रति भेदभाव व्यवहार के लिए चेतावनी दी। वस्तुत: दक्षिण अफ्रीका ने गाँधीजी
को ‘महात्मा’ बना दिया।
प्रश्न 41. महात्मा गाँधीजी जिस समय दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे थे उस समय
के भारतीय राजनीतिक वातावरण की दो प्रमुख राष्ट्रवादी विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-1. गाँधीजी 1893 स्वदेश छोड़कर गए थे तथा 1915 में गृहभूमि वापस आए। यद्यपि
अभी भारत ब्रिटिश उपनिवेश ही था लेकिन अब वह राजनीतिक दृष्टि से अधिक सक्रिय
(Active) हो गया था। देश के ज्यादातर शहरों एवं कस्बों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शाखाएँ
थीं। यह दल देश के मध्यम वर्ग में बहुत ही लोकप्रिय हो चुका था।
2. देश में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र अखिल भारतीय (All India) हो गया था।
इसका प्रमाण लाल, बाल तथा पाल की संपूर्ण राष्ट्र में समान ख्याति एवं लोकप्रियता थी, जबकि
तीनों के नेताओं के मूल निवास क्षेत्र (पंजाब, महाराष्ट्र तथा बंगाल) एक-दूसरे से बहुत दूर थे।
प्रश्न 42. गाँधीजी के स्वदेश लौटने के समय लड़ाकू (जुझारू) या गरम प्रवृत्ति तथा
उदारवादी नेताओं में जो एक प्रमुख अंतर था, उसका उल्लेख कीजिए।
उत्तर-लाल, बाल तथा पाल जैसे लड़ाकू (जुझारू या गरम) प्रवृत्ति के राष्ट्रवादी नेताओं
ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के प्रति लड़ाकू विरोध का समर्थन किया। वहीं उदारवादियों का
एक समूह एक क्रमिक तथा लगातार प्रयास करते रहने का पक्षधर (हिमायती) था।
प्रश्न 43. आप कैसे कह सकते हैं कि गाँधीजी सर्वसाधारण के पक्षधर एवं हिमायती
थे ? 1916 से 1918 के मध्य की घटनाओं से इस कथन/मत की पुष्टि कीजिए।
उत्तर-1. फरवरी 1916 को जब गाँधीजी अपनी बारी आने पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
के उदघाटन समारोह के वक्त बोले तो उन्होंने मजदूर गरीबों की ओर ध्यान न देने के कारण
विशिष्ट वर्ग को आड़े हाथों लिया। उन्होंने समारोह में केवल धनी, कुलीन लोगों की उपस्थिति
तथा लाखों गरीब भारतीयों की अनुपस्थिति के बीच की विषमता पर अपनी चिंता प्रकट की।
2. गाँधीजी ने कई बार कहा कि हमारे लिए स्वशासन का तब तक कोई अभिप्राय नहीं है
जब तक हम किसानों से उनके श्रम का लगभग संपूर्ण लाभ स्वयं या अन्य लोगों को देने की
अनुमति देते रहेंगे। हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। दिसंबर 1916 में उन्होंने चम्पारन (बिहार) में नील उत्पादकों द्वारा किसानों के शोषण तथा 1918 में अहमदाबाद के वस्त्र मिल मजदूरों के हितों के लिए तथा खेड़ा के किसानों के लिए सत्याग्रह किया।
                                               लघु उत्तरीय प्रश्न
                              (Short Answer Type Questions)
प्रश्न 1. संक्षेप में रॉलेक्ट एक्ट के प्रति भारतीय प्रतिक्रिया का विवेचन कीजिए। [B.M.2009A]
उत्तर-1 मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों (1919) से भारतीय राष्ट्रीय नेताओं में घोर निराशा व
असंतोष देखकर सरकार बुरी तरह घबरा उठी। सरकार ने असंतोष को दबाने के लिए अपना
दमनचक्र चला दिया।
2. सरकार ने 1919 ई.के प्रारंभ में रॉलेक्ट एक्ट पास दिया। इस एक्ट से सरकार को दो
व्यापक अधिकार मिले-
(i) इस एक्ट के द्वारा सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए तथा दोषी सिद्ध
किए जेल में बंद कर सकती थी।
(ii) सरकार को यह अधिकार दिया गया कि वह बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus)
के अधिकार को स्थगित कर सकती थी।
3. इस एक्ट के कारण लोगों में रोष की लहर दौड़ गई। अतः देश में विरोध होने लगा।
देश भर में विरोध सभाएँ, प्रदर्शन और हड़तालें हुईं। सेंट्रल लेजिस्लेटिव कौंसिल से तीन भारतीय
सदस्यों-मोहम्मद अली जिन्ना, मदन मोहन मालवीय और मजरूलहक ने इस्तीफा दे दिया। सरकार ने दमन शुरू किया। कई स्थानों पर उसने लाठी-गोली आदि का सहारा लिया। इस एक्ट के विरुद्ध गाँधीजी ने सत्याग्रह किया। पंजाब के जालियाँवाला बाग में इसी एक्ट के विरुद्ध शांतिपूर्ण जनसभा हो रही थी जिससे क्रुद्ध होकर जनरल डायर ने हित्थे लोगों पर गोलियों की वर्षा करवा दी थी।
प्रश्न 2. किस तरह असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन राष्ट्रवादी आंदोलन
में नई अवस्था के सूचक हैं ?
उत्तर-खिलाफत आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई धारा का उदय हुआ। लखनऊ
समझौते ने हिंदुओं और मुसलमानों की साझी राजनीतिक गतिविधियों के लिए पहले ही जमीन तैयार कर दी थी। रॉलेक्ट कानून, विरोधी राष्ट्रीय आंदोलनों एवं समूची भारतीय जनता को राजनीतिक आंदोलन में ले आया था।
उदाहरण के लिए, राजनीतिक गतिविधियों के क्षेत्र में हिंदू-मुसलमान एकता का उदाहरण
संसार के सामने रखने के लिए मुसलमानों ने आर्यसमाजी नेता स्वामी श्रद्धानंद को आमंत्रित किया था कि वे दिल्ली की जामामस्जिद में अपना उपदेश दें। इसी प्रकार, अमृतसर में यह राजनीतिक एकता सरकार के दमन के कारण थी। इस वातावरण में मुसलमानों के बीच राष्ट्रवादी प्रवृत्ति ने खिलाफत आंदोलन का रूप ले लिया। इसी तरह गाँधीजी आंदोलन की कार्यसमिति के सदस्य बने। सच तो यह है कि इन दोनों आंदोलनों ने भारत के दो प्रमुख संप्रदायों को एक पंक्ति में ला खड़ा किया और अंग्रेजी साम्राज्य को एक नवीन चुनौती दी।
प्रश्न 3. गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर-गाँधीजी का रचनात्मक कार्यक्रम (Constrictive Programme of Gandhiji):
गाँधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने रचनात्मक कार्यक्रम को बहुत बढ़ावा दिया। वे केवल राजनैतिक स्वतंत्रता ही नहीं चाहते थे अपितु जनता की आर्थिक-सामाजिक और आत्मिक उन्नति चाहते थे।
इस भावना से उन्होंने ‘ग्राम उद्योग संघ’ तालीमी संघ और गौ रक्षा संघ बनाए। उन्होंने समाज
में शोषण समाप्त करने के लिए भूमि और पूँजी का समाजीकरण नहीं माँगा अपितु आर्थिक क्षेत्र
के विकेंद्रीकरण द्वारा इस प्रश्न को हल करना चाहा। उन्होंने कुटीर उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए
काम किया। खादी उनके आर्थिक तंत्र का आधार थी।
प्रश्न 4. गाँधीजी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के बाद के सालों में भयंकर
सांप्रदायिक संघर्ष क्यों हुए ?
उत्तर-1. असहयोग आंदोलन में जब उतार आया और जनता में कुंठा की भावना भर गई
तो ऐसी स्थिति में सांप्रदायिकता अपना घिनौना सिर उठाने लगी। सांप्रदायिक तत्वों ने स्थिति का
फायदा उठाकर अपने विचारों का प्रचार किया और 1923 के बाद देश में एक के बाद एक कई
सांप्रदायिक दंगे हुए।
2. मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा फिर सक्रिय हो उठी। नतीजा यह हुआ कि “हम सबसे
पहले भारतीय हैं” यह भावना जो काफी पहले से चली आ रही थी इसको गहरा धक्का लगा।
स्वराज्य पार्टी के नेता मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास कट्टर राष्ट्रवादी थे, मगर संप्रदायिकता
ने इस पार्टी को भी विभाजित कर दिया।
3. “प्रत्युत्तरवादी” (रिस्पॉसिविस्ट) कडे जाने वालों के एक वर्ग ने सरकार को अपना
सहयोग करने का प्रस्ताव रखा ताकि तथाकथित हिंदू हितों की रक्षा की जा सके। इस गुट में
मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपतराय और एन.सी. केलकर शामिल थे। उन्होंने मोतीलाल नेहरू पर हिंदुओं को धोखा देने, हिंदू-विरोधी होने, गौहत्या का पक्ष लेने तथा गौमांस खाने का आरोप लगाया। सत्ता के फेंके हुए टुकड़ों को हथियाने के लिए लड़ने में मुस्लिम संप्रदायवादी कभी पीछे नहीं रहे।
4. गाँधीजी ने बार-बार जोर देकर कहा था कि “हिंदू-मुस्लिम एकता हर काल में और
सभी परिस्थितियों में हमारी आस्था होनी चाहिए।” उन्होंने ही हस्तक्षेप करके स्थिति सुधारने की
कोशिश की। सांप्रदायिक दंगों के रूप में देखी गई दरिंदगी का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने
दिल्ली में मौलाना मुहम्मद अली के घर में सितंबर 1924 में 21 दिनों का उपवास किया, लेकिन
उनके प्रयासों को कोई विशेष सफलता नहीं मिली।
प्रश्न 5. साइमन कमीशन भारत क्यों आया था?                           (V. Imp.)
उत्तर-1919 ई० के एक्ट के अनुसार यह निर्णय हुआ था कि प्रत्येक दस वर्ष के बाद सुधारों
का मूल्यांकन करने के लिए इंग्लैंड से एक कमीशन भारत आयेगा। इसलिए 1928 ई० में जॉन
साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग (Commission) भारत आया था। इस आयोग में एक भी भारतीय न था, जबकि इसका उद्देश्य भारत के हितों की देखभाल करना था। अत: भारतीयों ने इसका स्थान-स्थान पर बहिष्कार और जोरदार विरोध किया। जहाँ भी यह आयोग गया, वहाँ पर भारतीयों ने इसका काले झंडे दिखाकर ‘साइमन वापस जाओ’ के नारों के साथ बहिष्कार किया। अंग्रेजों ने प्रदर्शनकारियों का दमन बड़ी क्रूरता से किया। जब यह आयोग लाहौर पहुँचा, तो लाला लाजपतराय ने प्रदर्शन कर रहे जुलूस का नेतृत्व किया। पुलिस के भीषण लाठी प्रहार से लाला जी को कई गहरी चोटें लगी जिनके फलस्वरूप बाद में उनकी मृत्यु को गई। इसी तरह से लखनऊ में जुलूस का नेतृत्व पंडित जवाहर लाल नेहरू कर रहे थे। उन पर भी जब लाठी प्रहार होने लगा, तो गोविंद बल्लभ पंत ने तुरंत अपना सिर उनके सिर पर रख दिया जिसके फलस्वरूप पंत जी को पक्षाघात हो गया और जीवन भर वे अपनी गर्दन सीधी रखकर न बैठ पाये।
प्रश्न 6. साइमन कमीशन के क्या परिणाम निकले ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-1. भारतीय जान गये थे कि अंग्रेज उनके हितों के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। उनके
मन में चोर है, तभी तो उन्होंने किसी भारतीय सदस्य को आयोग में नहीं रखा था। उसकी कुटिल
प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आ रही थीं।
2. इससे लोगों में राष्ट्रीय भावनाओं का संचार शीघ्रता से होने लगा था।
3. स्त्रियों ने पहली बार इस आंदोलन में भाग लिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आदोलन को
एक नया मोड़ दिया।
4. हिन्दू व मुसलमान एकत्रित होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े।
5. विदेशी माल के बहिष्कार के फलस्वरूप भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला।
6. शिक्षा के प्रसार के लिए अधिक-से-अधिक राष्ट्रीय विद्यालय खोलने का प्रयास किया गया।
प्रश्न 7. पूना समझौता क्या था ? इसमें महात्मा गाँधी की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
उत्तर-पूना समझौते का अर्थ (Meaning of Poona Pact) : सांप्रदायिक पंचाट (Com-
munal Award) के विरुद्ध भारत के प्रमुख नेताओं-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पं. मदनमोहन मालवीय, घनश्याम दास बिड़ला, राजगोपालाचारी और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने पूना में एकत्र होकर विचार-विनिमय किया। उन्होंने गाँधीजी और डॉ. अंबेडकर की स्वीकृति का एक समझौता तैयार किया, जो पूना समझौता कहलाता है। इसे ब्रिटिश सरकार ने भी मान लिया।
समझौते की मुख्य शर्तें (Main terms of the Poona Pact):
(i) सांप्रदायिक पंचाट में दलितों के लिए प्रांतीय व्यवस्थापिका सभाओं में सभी राज्यों में
निर्धारित 71 स्थानों को बढ़ाकर 148 कर दिया गया।
(ii) संयुक्त चुनाव प्रणाली की व्यवस्था की गई। दलितों के लिए चुनाव क्षेत्र की व्यवस्था
समाप्त कर दी गई।
(iii) स्थानीय संस्थाओं और सार्वजनिक सेवाओं में दलितों के लिए उचित प्रतिनिधित्व
निश्चित किया गया।
(iv) दलितों की शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की सिफारिश की गई।
(v) यह योजना आरंभ में 10 वर्षों के लिए थी।
पूना समझौते से अंग्रेजों द्वारा सांप्रदायिक पंचाट के माध्यम से दलितों को हिन्दुओं से अलग
करने के षड्यंत्र में कमी आ गई। गाँधीजी ने पंचाट के विरुद्ध 20 सितंबर, 1932 ई. को आमरण
अनशन शुरू कर दिया था। पूना समझौते के बाद 26 दिसंबर, 1932 ई. को उन्होंने अपना अनशन तोड़ दिया।
प्रश्न 8. आधुनिक भारत के निर्माण में डॉ. बी. आर, अंबेडकर के प्रमुख योगदानों का
मूल्यांकन कीजिए। उनके द्वारा स्थापित किसी एक संगठन का नामोल्लेख कीजिए।
                          [B.M.2009A,B.Exam.2009{Arts), B.Exam.2013(A)]
उत्तर-1. 1930 तक डॉ. अंबेडकर की प्रसिद्धि राष्ट्रीय स्तर तक फैल गई और वह अछूतों,
कमजोर और दलितों के नेता बन गए। उन्होंने प्रथम गोलमेज कांफ्रेंस में दलितों की दशा का सही
चित्रण किया। उन्होंने उनके अलग मताधिकार की मांँग भी की।
2. 1932 में ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को दबाने के लिए कठोर दमनकारी
नीति अपनाई। कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया और अनेक नेताओं को बंदी बना लिया
गया। इसी बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मेकडॉनाल्ड ने 16 अगस्त, 1932 को एक घोषणा की जिसे
मेकडॉनाल्ड निर्णय या सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award) भी कहते हैं। इसके अनुसार
दलितों को हिन्दुओं से अलग मानकर उन्हें अलग प्रतिनिधित्व देने को कहा गया और दलित वर्गों
के लिए अलग निर्वाचन मंडल का प्रावधान किया गया।
3. गाँधीजी ने इसका विरोध किया और जेल में ही 20 सितम्बर, 1932 को आमरण अनशन
कर दिया। उन्हें यह दलितों को हिन्दुओं से अलग करने का सरकारी षड्यंत्र लगा।
4. गाँधीजी के मरणासन्न होने पर देश के कई प्रमुख नेता जैसे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पं.
मदनमोहन मालवीय, घनश्याम दास बिड़ला, राजगोपालाचारी के साथ डॉ. अंबेडकर भी पूना में
इकट्ठे हुए। उन्होंने विचार-विनिमय कर गाँधीजी और डॉ. अंबेडकर की स्वीकृति से एक समझौता
किया, जो पूना समझौता कहलाता है।
5. जुलाई, 1924 में उन्होंने बंबई (मुम्बई) में एक ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ बनाई,
जिसका उद्देश्य अस्पृश्यों का सामाजिक और आर्थिक उत्थान करना था। उन्होंने अछूतों के लिए
मंदिरों में प्रवेश और कुओं से पानी भरने की व्यवस्था करवाई।
प्रश्न 9. आजाद हिंद फौज की रचना और गतिविधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-1. सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन अंग्रेजों के साथ सशस्त्र संघर्ष
के लिए किया था। दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होते ही सुभाषचंद्र बोस को उनके कलकत्ता
(कोलकाता) स्थित निवास पर नजरबंद कर दिया गया जिससे कि वे अपनी क्रांतिकारी गतिविधियाँ अंग्रेजों के विरुद्ध प्रयुक्त न चला सकें।
2. 1941 ई. में अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर वे अफगानिस्तान के मार्ग से जर्मनी पहुँच
गये। 1943 ई. में बर्मा पहुँच कर जापान द्वारा बंदी किए गये भारतीय सैनिकों को संगठित करके
‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया।
3. लोग प्यार से सुभाषचंद्र बोस को नेताजी कहते थे। नेताजी ने युवकों को ललकारा और
कहा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंँगा।” उन्होंने अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने
के लिए विदेशों से भी सहायता ली।
4. 1945 ई. जापान की पराजय के बाद भारत की सीमा तक पहुँची हुई आजाद हिन्द फौज
के पाँव उखड़ गये। अत: आजाद हिन्द फौज (Indian National Army) के कई बड़े सैनिक
अधिकारी और सिपाही अंग्रेजों ने पकड़ लिए।
प्रश्न 10. वेवल योजना क्या थी? लार्ड वेवल की भूमिका का महत्व एवं इस योजना
की गतिविधियों के साथ-साथ शिमला सम्मेलन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-14 जून, 1945 को लार्ड वेवल ने एक योजना रखी, जिसे वेवल योजना के नाम से
जाना जाता है। इस योजना की मुख्य बातें निम्नलिखित थीं-
1. भारत में व्याप्त जनाक्रोश को कम करना।
2. जापान के विरुद्ध भारत को सहयोग प्रदान करना।
3. ब्रिटेन के आगामी चुनाव के लिए अनुदार दल के प्रति जनमत प्राप्त करना।
4. इससे स्वशासन की माँग और वायसराय की कार्यकारिणी समिति में मुसलमानों व हिन्दुओं की संख्या को बराबर करने को कहा गया।
शिमला अधिवेशन : वेवल ने देश के सभी दलों के प्रमुख नेताओं को शिमला में 25 जून,
1945 को आमंत्रित किया। यह सम्मेलन वेवल योजना पर विचार करने के लिए बुलाया गया, इसमें 21 भारतीय नेता शामिल थे। सम्मेलन अच्छे ढंग से चल रहा था लेकिन जिन्ना इस बात पर अड़ गए कि केवल मुस्लिम लीग ही सारे भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती है। अतः यह सम्मेलन असफल हो गया।
प्रश्न 11. महात्मा गाँधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
                                                                                (NCERT T.B.Q.1)
उत्तर-महात्मा गाँधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए निम्न कार्य किए :
(i) उन्होंने सबसे पहले अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले के कहने के अनुसार एक
वर्ष तक ब्रिटिश भारत की यात्रा की ताकि वे इस भूमि और इसके लोगों को अच्छी तरह जान सकें।
(ii) उन्होंने सर्व-साधारण गरीब लोगों, नील की खेती करने वाले मजदूरों, अहमदाबाद के
मिल मजदूरों और खेड़ा में गरीब किसानों के हित में बात की और उनकी सहानुभूति प्राप्त करने
की कोशिश की।
(iii) उन्होंने सर्व-साधारण की तरह मामूली कपड़े विशेषकर खद्दर के कपड़े पहने। हाथ
में आम किसान की तरह लाठी उठाई, चरखा काता, कुटीर उद्योग-धंधों, हरिजनों के हितों,
महिलाओं के प्रति सद्व्यवहार और सच्ची सहानुभूति रखने के साथ ही बार-बार यह दोहराया
कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, किसानों और गरीब लोगों की समृद्धि और खुशहाली
के बिना देश की उन्नति नहीं हो सकती।
प्रश्न 12. किसान महात्मा गाँधी को किस तरह देखते थे ? (NCERT T.B.Q.2)
उत्तर-किसान महात्मा गाँधी को अपना हितैषी समझते थे। वे मानते थे कि गाँधी जी
भू-राजस्व को कम कराने, उदारतापूर्वक भू-राजस्व वसूली के लिए सरकार-सरकारी अधिकारियों, जमींदारों, जोतदारों, ताल्लुकदारों पर दबाव डाल सकते हैं।
किसान यह भी मानते थे कि गाँधी जी किसानों को हर तरह से शोषण से मुक्ति दिला सकते
हैं। गाँधीजी उन्हें समझते हैं और वे उनकी भाषा में उन्हें हर समय समस्या के समाधान भी सुलझा सकते हैं। वे ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित समस्याओं और किसानों के कुटीर धंधों के समर्थक थे। किसान गाँधीजी को जन-प्रिय नेता और अपने में से एक समझते थे। उन्हें विश्वास था कि गाँधीजी उन्हें अंग्रेजों की दासता, जमींदारों के शोषण और साहूकारों के चंगुल से अहिंसात्मक आंदोलनों और शांति-प्रिय प्रतिरोध के द्वारा मुक्ति दिलाएँगे।
प्रश्न 13. नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था ?
                                                                              (NCERT T.B.Q.3)
उत्तर-नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण मुद्दा इसलिए बन गया क्योंकि उन दिनों
के उत्पादन और विकय पर ब्रिटिश राज्य को एकाधिकार प्राप्त था। नमक गरीब से गरीब और
अमीर से अमीर सभी धर्मों, जातियों, वर्गों, वर्णो, लिंगों और क्षेत्रों के लोगों द्वारा प्रयोग में लाया
जाता था। नमक कानून को तोड़ने का मतलब था विदेशी दासता और ब्रिटिश शासन की अवज्ञा
करना, उससे प्रेरित होकर छोटे-छोटे अन्य कानूनों को तोड़ना ताकि स्वराज्य और पूर्ण स्वतंत्रता
स्वतः ही देशवासियों को मिल जाए और स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम उद्देश्य पूरा हो सके।
प्रश्न 14. राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए अखबार महत्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं ?
                                                                         (NCERTT.B.Q.4)
उत्तर-राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए अखबार अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण स्रोत हैं :
(i) अखबार जनसंचार के सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं और यह विशेषकर पढ़े-लिखे व्यक्तियाँ
पर प्रभाव डालते हैं और प्रबुद्ध लोगों, लेखकों, कवियों, पत्रकारों, साहित्यकारों, विचारकों से
प्रभावित होते हैं।
(ii) अखबार जनमत का निर्माण और अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। यह सरकार और सरकारी
अधिकारियों और लोगों में विचारों और समस्या के विषय में जानकारी और प्रगति में हो रहे कामों और उपेक्षित कार्यों और क्षेत्रों की जानकारी देते हैं।
(iii) राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान अखबार जिन लोगों के द्वारा पढ़े जाते हैं वे देश में होने
वाली घटनाओं, नेतागणों और अन्य लोगों की गतिविधियों, विचारों आदि को जानते हैं।
प्रश्न 15. चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया ?
उत्तर-चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक इसलिए चुना गया क्योंकि चरखा गाँधीजी को प्रिय
था। गाँधीजी मानते थे कि आधुनिक युग में मशीनों ने मानव को गुलाम बनाकर श्रमिकों के हाथों
से काम और रोजगार छीन लिया है। उन्होंने मशीनों की आलोचना की और चरखे को ऐसे मानव
समाज के प्रतीक के रूप में देखा जिसमें मशीनों और प्रौद्योगिकी को बहुत महिमामंडित नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार भारत एक गरीब देश है। चरखा गरीबों को पूरक आदमनी (Supple-ment) प्रदान करेगा जिससे वे स्वावलंबी बनेंगे, उन्हें बेरोजगारी और गरीबी से छुटकारा दिलाने में चरखा उन्हें स्वावलंबी बनाकर मदद करेगा। गाँधीजी मानते थे कि मशीनों से श्रम बचाकर लोगों को मौत के मुंह में धकेलना या उन्हें बेरोजगार करके सड़क पर फेंकने के बराबर है। चरखा धन के केन्द्रीयकरण को रोकने में भी मददगार है।
प्रश्न 16. पृथक् निर्वाचिका के बारे में क्या समस्या थी ? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर-गोलमेज सम्मेलन के दौरान महात्मा गाँधीजी ने दलित वर्गों के लिए पृथक् निर्वाचक
प्रस्ताव के विरुद्ध अपनी दलील पेश करते हुए कहा था कि अस्पृश्यों के लिए अलग से निर्वाचिका
की व्यवस्था करना एक तरह से दासता या उनकी दयनीय स्थिति को स्थायी रूप देने के बराबर
है। गाँधीजी हिन्दू समाज की एकता, समानता और भाईचारे के पक्षपाती थे। वे चाहते थे संयुक्त
निर्वाचक मंडल बने। सारे हिन्दू मिलकर अस्पृश्यों को भी चुनें ताकि छुआछूत तुरंत समाप्त हो,
उनके विचारानुसार यदि अस्पृश्यों के लिए अलग चुनाव मंडल की व्यवस्था की जाएगी तो अस्पृश्य हमेशा के लिए अस्पृश्य ही बने रहेंगे। यह व्यवस्था उनके प्रति कलंक का भाव और विचार को सुदृढ़ करेगी। उनके अनुसार आवश्यकता इस बात की थी कि छुआछूत को हमेशा के लिए बिना समय खोए तुरंत समाप्त कर दिया जाए। सारा समाज एक वर्ग होगा। न कोई श्रेष्ठ होगा, न कोई दलित होगा। जब हम सब मिलकर अस्पृश्यता जैसी गलत व्यवस्था और गैर-कानूनी व्यवस्था को नष्ट कर देंगे तो किसी को भी पृथक् निर्वाचिका की जरूरत नहीं होगी।
प्रश्न 17. चौरी चौरा की घटना का क्या महत्व था ?                      [B.M.2009A]
उत्तर-जब असहयोग आंदोलन अपने पूरे शबाब पर था। उसी समय 1922 ई० में गोरखपुर
के चौरी-चौरा में एक कांग्रेसी जुलूस द्वारा थाने में आग लगाये जाने तथा 21 लोगों के जल भरने
की घटना से दुःखी होकर गाँधीजी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित अपने आंदोलन को तीव्र
विरोध के बावजूद वापस लेने की घोषणा कर दी। राष्ट्र स्तब्ध था परंतु गाँधीजी अपने सिद्धांतों
एवं उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह अडिग थे।
प्रश्न 18. डांडी यात्रा का क्या उद्देश्य था?                           [B.M.2009A]
उत्तर-1930 ई० में गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरंभ डांडी यात्रा से हुआ।
गाँधीजी अपने 79 कार्यकर्ताओं के साथ साबरमती से समुद्र तट पर स्थित डांडी पहुँचे और नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। नमक जैसे आम आदमी की चीज द्वारा कानून तोड़ने की धारणा ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का देश में तेजी से प्रसार किया। गांधीजी की गिरफ्तारी के बावजूद इस आंदोलन ने भारतीयों में आत्मविश्वास और जुझारूपन की भावना बढ़ाई तथा ब्रिटिश कानूनों को चुनौती मिली।
प्रश्न 19. चंपारण सत्याग्रह का संक्षिप्त विवरण दीजिए। [B.M.2009A]
उत्तर-1917 ई० में गाँधीजी ने बिहार के चंपारण में किसानों के आंदोलन में भाग लिया।
विवाद का कारण था-वह अनुबंध जिसके कारण किसानों को बगान मालिकों के हित में अपनी
जमीन के एक निश्चित भाग (3/20) में नील की खेती करनी होती थी। इसे तीन कठिया पद्धति
भी कहा जाता था। आंदोलन के फलस्वरूप सरकार को तिन कठिया पद्धति की समाप्ति की घोषणा करनी पड़ी। यह गाँधीजी का भारत में प्रारंभिक सत्याग्रह आंदोलन था।
प्रश्न 20. गांधीजी 1917 में चम्पारण क्यों गए ? वहाँ उन्होंने क्या किया ?
                                                                                     [B.Exam.2010(A)]
उत्तर-चम्पारण का मामला महात्मा गाँधी के सामने आया। 19वीं सदी के प्रारम्भ में गोरे
बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध किया जिसके अनुसार किसानों को अपनी जमीन के
3/20वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। इस ‘तिनकठिया’ पद्धति कहा जाता था।
किसान इस अनुबन्ध से मुक्त होना चाहते थे। 1917 में चम्पारण के राजकुमार शुक्ल के अनुरोध
पर गाँधीजी चम्पारण पहुंँचे। गाँधीजी के प्रयासों से सरकार ने चम्पारण के किसानों की जाँच हेतु
एक आयोग नियुक्त किया। अन्त में गाँधीजी की विजय हुई।
प्रश्न 21. चम्पारण आन्दोलन के क्या कारण थे ?                  [B.Exam.2012(A)]
उत्तर-चम्पारण आन्दोलन के दो कारण इस प्रकार हैं-
(i) चम्पारण (बिहार) में यूरोपीय निलहे यहाँ के किसानों से नील की खेती कराते थे और
उनके ऊपर अनेक प्रकार के अत्याचार करते थे। उन्हें अपने उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिलता था।
(ii) महात्मा गाँधी अफ्रीका के अपने आन्दोलन के अनुभव को चम्पारण में दोहराना चाहते
थे। इसलिए वहाँ के किसानों को सहायता करने का आश्वासन दिया।
प्रश्न 22. असहयोग आन्दोलन के कारणों पर प्रकाश डालें। [B.Exam.2012(A)]
उत्तर-गाँधी जी ने 1920 ई० में असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया। इसके निम्नलिखित
कारण थे-
(i) रॉलेक्ट एक्ट : प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 ई० में रॉलेक्ट एक्ट पास किया गया।
इसके द्वारा सरकार अकारण ही किसी व्यक्ति को बन्दी बना सकती थी। इससे असंतुष्ट होकर
महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन चलाया।
(ii) जालियाँवाला बाग की दुर्घटना : रॉलेक्ट एक्ट का विरोध करने के लिए अमृतसर में
जालियाँवाला बाग के स्थान पर एक जनसभा बुलायी गई। जनरल डायर ने इस सभा में एकत्रित
लोगों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलायीं। भयंकर हत्याकाण्ड हुआ। महात्मा गाँधी ने इस हिंसात्मक घटना से दु:खी होकर असहयोग आन्दोलन आरंभ कर दिया।
प्रश्न 23. कांग्रेस में उग्रवादियों की भूमिका का परीक्षण करें। [B.Exam. 2011 (A)]
उत्तर-उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम अथवा बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस में एक नए एवं तरूण दल का उदय हुआ जो पुराने नेताओं के आदर्श तथा ढंगों
का प्रखर आलोचक था। उनका ध्येय था कि कांग्रेस का लक्ष्य स्वराज होना चाहिए। वे कांग्रेस
की उदारवादी नीतियों का विरोध करते थे।
1905 से 1919 का काल भारतीय इतिहास में उग्रवादी युग के नाम से जाना जाता है। उस
युग के नेताओं में बालगंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय आदि प्रमुख थे।
उग्रवादियों ने विदेशी माल का बहिष्कार और स्वदेशी माल को अंगीकार करने पर बल दिया।
                                            दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
                          (Long Answer Type Questions)
प्रश्न 1. राजनीति में प्रवेश से पूर्व महात्मा गाँधी के जीवन व गतिविधियों पर प्रकाश
डालते हुए उनके प्रमुख राजनीतिक विचार भी लिखिए।
उत्तर-राजनीतिक नेता के रूप में गाँधीजी का आरंभिक विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ
और यहीं उनके राजनीतिक विचार परिपक्व हुए।
गाँधीजी और उनके विचार (Gandhiji and his thoughts) : मोहनदास करमचंद गाँधी
का जन्म गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर, 1869 को हुआ था। ब्रिटेन में कानून
की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वे वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए। न्याय की
उच्च भावना से प्रेरित होकर उन्होंने नस्लवाद, अन्याय, भेदभाव और हीनता के विरुद्ध संघर्ष किया जिसका शिकार दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को होना पड़ रहा था।
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति तथा गाँधीजी का नेतृत्व (Position of the
Indians in South Africa and leadership of Gandhiji): (i) दक्षिण अफ्रीका में भारत से आए मजदूरों और व्यापारियों को मत देने का अधिकार नहीं था।
(ii) उन्हें पंजीकरण कराना तथा चुनाव कर देना पड़ता था।
(iii) उनको गंदी और भीड़ भरी उन बस्तियों में ही रहना होता था जो उनके लिए निर्धारित थीं।
(iv) कुछ दक्षिणी अफ्रीकी उपनिवेशों में एशियाई और अफ्रीकी लोग रात के नौ बजे के
बाद घर से बाहर नहीं निकल सकते थे। गाँधीजी इन स्थितियों के विरोध में चलने वाले संघर्ष
के शीघ्र ही नेता बन गए। 1893-94 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी अधिकारियों के
विरुद्ध एक वीरतापूर्ण परंतु अहिंसक संघर्ष चलाया। यही वह संघर्ष था जिसके दौरान उन्होंने सत्य और अहिंसा पर आधारित अपने राजनीतिक विचारों का प्रतिवाद किया।
गाँधीजी के राजनीतिक विचार (Political thoughts of Gandhiji) : (i) गाँधीजी के
अनुसार एक आदर्श सत्याग्रही सत्यप्रेम और शांतिप्रिय होता है, परंतु वह जिस बात को गलत
समझता है उसे स्वीकार करने से दृढ़तापूर्वक इंकार कर देता है। वह गलत काम करने वालों के
विरुद्ध संघर्ष करते हुए हँसकर कष्ट सहन करता है। यह संघर्ष उसके सत्यप्रेम का ही अंग होता
है, परंतु बुराई का विरोध करते हुए वह बुरे से प्रेम करता है। एक सच्चे सत्याग्रही की प्रकृति
में घृणा के लिए कोई स्थान नहीं होता। इसके अतिरिक्त वह बिल्कुल निडर होता है। चाहे जो
परिणाम हो, वह बुराई के सामने नहीं झुकता।
(ii) गाँधीजी की दृष्टि से अहिंसा कायरों और कमजोरों का अस्त्र नहीं है। केवल निडर और वीर लोग ही इसका उपयोग कर सकते हैं। वे हिंसा को कायरता से अधिक स्वीकार योग्य समझते
थे। 1920 में अपने साप्ताहिक पत्र ‘यंग इंडिया’ में एक प्रसिद्ध लेख में उन्होंने लिखा था कि
“अहिंसा हमारी प्रजाति का धर्म है जैसे हिंसा पशु का धर्म है,” परंतु “अगर केवल कायरता और
हिंसा में किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा को चुनने की सलाह दूंगा। भारत कायरतापूर्वक
असहाय होकर अपने सम्मान की रक्षा के लिए शस्त्र उठाते देखना अधिक पसंद करूंगा।” एक
स्थान पर उन्होंने अपने पूरे जीवन-दर्शन की व्याख्या इस प्रकार की है:
“सत्य और अहिंसा ही वह अकेला धर्म है जिसका मैं दावा करना चाहता हूँ। मैं किसी
भी परामानवीय शक्ति का दावा नहीं करता; ऐसी कोई शक्ति मुझमें नहीं है।”
(iii) गाँधीजी के दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे विचार और कर्म
में कोई अंतर नहीं रखते थे। उनका सत्य-अहिंसा-दर्शन जोशीले भाषणों और लेखों के लिए न
होकर दैनिक जीवन के लिए था।
(iv) गाँधीजी को साधारण जनता की संघर्ष शक्ति पर अटूट भरोसा था। उदाहरण के लिए
1942 में जब उनसे यह पूछा गया कि वह “साम्राज्य की शक्ति का सामना” कैसे कर सकेंगे
तो उन्होंने उत्तर दिया था-“लाखों-लाख मूक जनता की शक्ति के द्वारा।”
(v) गाँधीजी को अपने जीवन में तीन अन्य लक्ष्य भी बड़े प्रिय थे। वे इन लक्ष्यों की प्राप्ति
के लिए अपने जीवन की आहुति भी दे सकते थे। इनमें से पहला लक्ष्य था-हिन्दू-मुस्लिम एकता।
दूसरा लक्ष्य था-छुआछूत विरोधी आंदोलन तथा तीस लक्ष्य था-स्त्रियों की दशा सुधारना।
वे एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जहाँ सभी समुदाय पूरे सम्मान से रहते हों,
“छुआछूत” नामक कोढ़ के लिए कोई जगह न हो और जहाँ “स्त्रियों को पुरुषों के बराबर
अधिकार” प्राप्त हों।
प्रश्न 2. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की प्रगति को 1918-1920 के दौरान प्रभावित
करने वाले दो प्रमुख घटनाकम क्या थे ?
उत्तर-1. 1918 ई. में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ। ब्रिटिश सरकार के भारत संबंधी
मामलों के मंत्री एडविन मांटेग्यू तथा वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने 1918 ई. में संविधान सुधारों
की एक योजना सामने रखी, जिसके आधार पर 1919 ई. का भारत सरकार अधिनियम बनाया
गया। इससे सरकार भारतीयों को संतुष्ट करना चाहती थी। भारतीयों को संतुष्ट करने का प्रयास
करते समय भी भारत सरकार दमन के लिए तैयार थी। मार्च, 1919 में सरकार ने केन्द्रीय विधान
परिषद् के एक-एक भारतीय सदस्य द्वारा विरोध के बावजूद रॉलेक्ट एक्ट पास कर दिया। इस
कानून में सरकार को अधिकार प्राप्त था कि किसी भी भारतीय पर मुकदमा चलाये बिना, उसे
जेल में बंद कर सके तथा उसकी कोई अपील, वकील और दलील न हो। इस काले कानून का
सारे देश में विरोध हुआ। 1919 ई. में मार्च और अप्रैल महीने में भारत में अभूतपूर्व राजनीतिक
जागरण आया। लगभग पूरे देश में एक नई स्फूर्ति आ गई। हड़तालें, काम रोको अभियान, जुलूस, प्रदर्शन आदि होते थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के नारों से आकाश लगा था। भारतीय जनता
अब अंग्रेजों की गुलामी का जुआ उतार कर फेंकना चाहती थी।
अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 ई. को बैसाखी वाले दिन एक शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर
रही जनता पर जनरल डायर ने गोलियों की बौछार करवा दी। पंजाब में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। चारों ओर लोग गुस्से से अपने दाँत पीस रहे थे, उन्हें अंग्रेजों के इस घृणित कृत्य पर भारी रोष था।
2. 1919 ई. में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। इससे भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को बल
मिला। ब्रिटेन तथा उसके सहयोगियों ने तुर्की की उस्मानिया सल्तनत के साथ जो व्यवहार किया
था और जिस तरह टुकड़े करके थ्रेस को हथिया लिया था, राजनीतिक चेतना प्राप्त मुसलमान उसके आलोचक थे। दिल्ली में नवंबर, 1919 ई. में आयोजित अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन ने फैसला किया कि अगर उनको माँगे न मानी गई तो वे सरकार को सहयोग करना बंद कर देंगे। इस समय मुस्लिम लीग गर राष्ट्रवादियों का नेतृत्व था। उसने राजनीतिक प्रश्नों पर राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके आदोलन का पूरा-पूरा समर्थन किया। बाल गंगाधर तिलक और गाँधीजी जैसे नेताओं ने खिलाफत आंदोलन को हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वर्ण अवसर समझा। गाँधीजी ने 1920 ई. के आरंभ में घोषणा की कि खिलाफत का प्रश संवैधानिक सुधारों तथा पंजाब के अत्याचारों से जुड़ी घटनाओं से अधिक महत्वपूर्ण है। उनहोंने यह भी घोषणा की कि अगर तुर्की के साथ शांति संधि की शर्ते भारतीय मुसलमानों को संतुष्ट नहीं करतीं, तो वे असहयोग आंदोलन छेड़ देंगे। वास्तव में गाँधीजी खिलाफत आंदोलन के एक नेता के रूप में उभरे।
3. इस बीच सरकार ने रॉलेक्ट एक्ट को रद्द करने, पंजाब में हो रहे अत्याचारों की भरपाई
करने या राष्ट्रवादियों की स्वशासन की आकांक्षा को संतुष्ट करने से इंकार कर दिया था। जून,
1920 ई. को इलाहाबाद में सभी दलों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों के बहिष्कार का एक कार्यक्रम बनाया गया। खिलाफत कमेटी ने 31 अगस्त, 1920 ई. को एक असहयोग आंदोलन आरंभ किया। लोगों से आग्रह किया गया कि वे सरकारी शिक्षा संस्थाओं (स्कूलों और कॉलेजों), अदालतों, सरकारी कार्यालयों आदि का बहिष्कार करेंगे। विदेशी वस्त्रों तथा अन्य वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे, सरकार से प्राप्त पद, प्रतिष्ठा सूचक सम्मान को वापस लौटा देंगे। हाथ से कते सूत के वस्त्र पहनेंगे। कांग्रेस ने जनसाधारण को आंदोलन में शामिल करके इसे जन-आंदोलन बना दिया।
प्रश्न 3. खिलाफत आंदोलन के शुरू होने के क्या कारण थे? भारतीय राष्ट्रवादी
आंदोलन में उसका क्या योगदान था ?
उत्तर-खिलाफत का संबंध खलीफा से है। खलीफा सभी मुसलमानों का धार्मिक मुखिया
था। तुर्की के सुल्तान को मुस्लिम जगत् का मुखिया स्वीकार किया जाता था। युद्ध के पश्चात्
राजनीतिक रूप से भारतीय मुसलमान अंग्रेजों तथा मित्र राष्ट्रों से इसलिए खिन्न थे, क्योंकि उन्होंने तुर्की के सुल्तान के साथ उचित व्यवहार नहीं किया था। उन्होंने तुर्की साम्राज्य का विभाजन भी कर दिया था और तुर्की का एक भाग (स) भी उससे छीन लिया था। यह उस युद्ध घोषणा के विपरीत बात थी जो ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जॉर्ज ने की थी। उसने घोषणा की थी कि हम तुर्की को एशिया माइनर और ग्रेस के उस भाग से वंचित नहीं कर रहे हैं जहाँ की मुख्य जनसंख्या तुर्की नस्ल से संबंधित है। मुसलमान यह नहीं चाहते थे कि तुर्की के सुल्तान के सम्मान को तनिक भी आँच आए। जब अंग्रेजों ने भारतीय मुसलमानों की आशा के विपरीत कार्य किए तो वह तुरंत संघर्ष की राह पर उतारू हो गए।
राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान (Contribution to the National Movement) : इस
संघर्ष से राष्ट्रवादी आंदोलन को बड़ा बल मिला। 1916 में लखनऊ समझौते के कारण हिन्दुओं
तथा मुसलमानों में एकता की भावना का बीजारोपण तो हो ही चुका था परंतु अब खिलाफत
आंदोलन के कारण अनेक राष्ट्रवादी नेता इसके समर्थन में उतर आए।
(1) खिलाफत समिति का गठन हुआ और देशव्यापी आंदोलन आरंभ हो गया।
(2) नवंबर, 1919 में दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन बुलाया गया। इसमें
यह प्रस्ताव पारित किया गया कि यदि उसकी माँगें नहीं मानी गई तो वे सरकार से हर प्रकार
का सहयोग वापस ले लेंगे।
(3) मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के प्रत्येक राजनीतिक आंदोलन का समर्थन किया।
(4) कांग्रेसी नेताओं ने खिलाफत आंदोलन का साथ देकर हिन्दू-मुस्लिम एकता को सुदृढ़
किया और मुस्लिम जनता को राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रेरित किया।
(5) गाँधीजी ने तो यहाँ तक घोषणा कर दी थी कि खिलाफत का प्रश्न सुधारों के प्रश्न
से भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि तुर्की के साथ किया गया शांति समझौता भारतीय मुसलमानों को संतुष्ट नहीं करेगा तो वे अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाएँगे। इस तरह गाँधीजी खिलाफत आंदोलन के एक महान नेता के रूप में उभरे।
(6) खिलाफत आंदोलन के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की गति तीव्र हुई और महात्मा
गाँधी ने शीघ्र ही असहयोग आंदोलन आरंभ किया। यह अंग्रेजी साम्राज्य का अंत करने की ओर
पहला कदम था।
प्रश्न 4. असहयोग आंदोलन कब आरंभ हुआ ? इसके उद्देश्य तथा कार्यकम क्या थे?
यह आंदोलन क्यों समाप्त हुआ ?                                        [B.M.2009A]
उत्तर-1. असहयोग आंदोलन (Non-Co-operation Movement) : सितंबर, 1920 ई.
में कलकत्ता (कोलकाता) में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ। इसमें सरकारी स्कूलों, सरकारी
उपाधियों, अदालतों तथा धारा सभाओं के बहिष्कार का प्रस्ताव रखा गया। जब यह प्रस्ताव पास हो गया, तो सारे देश में असहयोग आंदोलन आरंभ हो गया। महात्मा गाँधी ने गवर्नर जनरल द्वारा दी गई ‘केसर-ए-हिंद’ उपाधि को लौटा दिया। विद्यार्थियों में कक्षाओं का बहिष्कार किया। अनेक वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। हजारों व्यक्तियों ने ‘राथ बहादुर’ जैसी उपाधियाँ लौटा दी। नए एक्ट के अनुसार बनी धारा समाओं का बहिष्कार कर दिया गया। कोई भी कांग्रेसी चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़ा नहीं हुआ। अधिकांश जनता ने मतदान नहीं किया। विदेशी कपड़ों तथा अन्य वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के लिए प्रोत्साहन दिया गया।
नवंबर, 1921 ई. में जब प्रिंस ऑफ वेल्स का भारत आगमन हुआ, तो कांग्रेस ने उसका
बहिष्कार किया। उसके मुबई बंदरगाह पर पहुँचते ही शहर में दंगा हो गया। उसका हर स्थान
पर हड़तालों द्वारा स्वागत किया गया। कई स्थानों पर पुलिस ने लाठियों के बल पर हड़ताल तुड़वाई। इस समय तक गाँधीजी के अलावा प्राय: सभी नेता जेलों में भरे पड़े थे।
लार्ड चेम्सफोर्ड के स्थान पर लार्ड रीडिंग को भारत का अवसराय बनाया गया। आते ही
उसको 21 दिसंबर, 1921 ई. को कलकना (कोलकाता) की यात्रा करनी पड़ी, क्योंकि इसी दिन
प्रिंस ऑफ वेल्स को वहाँ पर पहुँचना था। नया वायसराय एवं कांग्रेस में समझौता न हो सका।
1921 ई. में दिसंबर के अंत में राजनीतिक बंदियों की संख्या 20,000 तक पहुँच गई थी। कुछ
समय के बाद यह संख्या 35,000 तक जा पहुंँची थी।
1922 ई. तक असहयोग आंदोलन अपनी चरम सीमा तक जा पहुंचा था। मोतीलाल नेहरू,
लाला लाजपतराय आदि बड़े-बड़े नेक जेलों में बंद पड़े हुए थे। इसी समय असहयोग आंदोलन
ने एक नया मोड़ ले लिया। फरवरी, 1922 ई. को गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान
पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने जमकर लाठी चार्ज किया। अतः क्रुद्ध प्रदर्शनकारियों ने थाने में आग लगा दी जिसमें 22 सिपाही जिंदा जलकर मर गये। गाँधीजी को इस हिंसक आंदोलन भारी धक्का लगा। वे नहीं चाहते थे कि लोग हिंसा में लिप्त होकर आंदोलन के आदर्शों को भूल जायें। अत: उन्होंने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।
मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय जैसे नेता यह सुनकर दंग रहे गये। जनसाधारण को भी
लगा कि उनकी स्वतंत्रता-प्राप्ति का सपना आसमान से गिरकर चूर-चूर हो गया है, परंतु प्रत्यक्ष
रूप से गाँधीजी का विरोध करने के लिए कोई भी साहस न जुटा सका। गाँधीजी की लोकप्रियता
कम होती देखकर सरकार ने मौके का फायदा उठाया और उनको छ: वर्ष के लिए कारावास
में भेज दिया।
प्रश्न 5. क्या गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन समाप्त करना ठीक था ? (Was it
correct to suspend Non-Cooperation Movement by Gandhiji):
उत्तर-गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन समाप्त करने की घोषणा से लाला लाजपतराय,
मोती लाल नेहरू, देशबंधु चितरंजन दास आदि नेताओं ने जेल में होते हुए भी आंदोलन की तीव्रता को समझकर गाँधीजी के इस अप्रत्याशित निर्णय को ठीक नहीं कहा था।
“गाँधीजी तथा कांग्रेस पर भारत के धनिक वर्ग और जमींदारों का बहुत अधिक प्रभाव था।
अतः उनके प्रभाव के अंतर्गत गाँधीजी ने सहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया था।”
लेकिन अधिकांश इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं। वास्तव में उस समय प्रायः सभी
बड़े-बड़े नेता बंदी बनाए जा चुके थे। अतः जनता ने जोश में आकर दिशाहीन भीड़ की तरह
व्यवहार करना शुरू कर दिया था। ऐसी दशा में गाँधीजी अपना आंदोलन आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे। उनके मतानुसार, “अहिंसा मानव जाति का गुण है, परंतु हिंसा पशुओं का गुण
यदि असहयोग आंदोलन स्थगित न किया जाता, तो वह व्यापक हिंसा में बदल जाता। सरकार
और जनता के बीच भयंकर युद्ध छिड़ जाता। सरकार कठोरता से जनता का दमन करती। अत:
असहयोग आंदोलन को बंद करके राजनीति में उमड़ती हुई हिंसा को दबा दिया गया। इसी प्रकार
गाँधीजी को आभास हो गया था कि यदि आंदोलन ने हिंसा का रूप धारण कर लिया, तो सरकार
कठोरता से उसका दमन करेगी। इससे लोगों में आतंक फैल जायेगा और स्वराज्य का प्रश्न बहुत
पीछे पड़ जायेगा।
असहयोग आंदोलन केवल चौरी-चौरा की घटना के कारण स्थगित नहीं किया गया था अपितु
वास्तविकता यह थी कि बाहर से तो हमारा आंदोलन बड़ा शक्तिशाली दिखाई देता था, प्रगति
कर रहा था, परंतु भीतर ही भीतर वह छिन्न-भिन्न हो रहा था।
अतः स्पष्ट है कि नेतृत्वहीन आंदोलन अक्सर अनियंत्रित भीड़ की तरह उमड़ जाता है। उसका
क्षणिक प्रभाव तो बड़ी तीव्रता लिए होता है, परंतु उसके दूरगामी प्रभाव बड़े घातक सिद्ध होते
हैं। अतः गाँधीजी का निर्णय विवेक पर तौला हुआ था।
3. क्या यह आंदोलन असफल रहा ? (Was this Movement unsuccessful) :
गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन आरंभ होने से पहले ही जनता को वचन दिया था कि वे एक वर्ष
के अंदर ही जनता को स्वराज्य दिला देंगे। उन्हें इसमें सफलता न मिली। इसके विपरीत लाखों
प्रदर्शनकारी जेलों में डाल दिए गये। इस विफलता का भार गाँधीजी के कंधों पर डाल दिया गया था।
एक वर्ष में स्वराज्य दिलाने का भरोसा दिलाना बड़ा अविवेक पूर्ण था। भारत की राजनीति
में खिलाफत के प्रश्न को लाना भी दुर्भाग्यपूर्ण था। तुर्की में कमालपाशा का शासन समाप्त होते ही खिलाफत के प्रश्न की जड़ कट गई। एक नेता को आंदोलन के सारे अधिकार देना विवेकपूर्ण
नहीं था।
4. असहयोग आंदोलन का मूल्यांकन (Evaulation of the Non-Co-opeation Move-
ment) : सच्चाई तो यह है कि असहयोग आंदोलन एक नया प्रयोग था। इससे पूर्व किसी अन्य
नेता ने ऐसा आंदोलन नहीं चलाया था। यद्यपि गाँधीजी अपने वचन के अनुसार जनता को एक
वर्ष में स्वराज्य दिलाने में असफल रहे, परंतु इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दीं।
इस आंदोलन से भारतीयों को निम्न लाभ मिले-
(i) इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया। अंग्रेजों को लगने
लगा कि बिना उदारवादियों के सहयोग से वे अब आगे नहीं चल पायेंगे।
(ii) सभी देशवासी एक झंडे के नीचे इकट्ठे हो गये। उनमें राष्ट्रीयता की भावना का संचार
हो गया।
(iii) जनता अब अधिक-से-अधिक स्वदेशी वस्तुएँ खरीदने का प्रयास करती थी। विदेशी
वस्तुओं का बहिष्कार करके ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को धक्का पहुँचाया।
(iv) हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा मानकर इसको बढ़ावा दिया गया। अंग्रेजी के महत्व को नकारा गया।
(v) कांग्रेस ने भी अपने दृष्टिकोण को बदलकर सक्रिय आंदोलन और सविनय अवज्ञा
आंदोलन को अपना ध्येय समझा।
प्रश्न 6. स्वराज्य पार्टी के गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिए। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष
में इनकी भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर-1. स्वराज्य पार्टी का गठन (Formation of Swarajya Party) : 1922 में
असहयोग आंदोलन को एकाएक गाँधीजी द्वारा स्थगित किए जाने से भारतीय नेताओं को निराशा के साथ कोध भी आया। फलस्वरूप कांग्रेस दो भागों-परिवर्तनकारी (Changers) और
अपरिवर्तनकारी (Non-changers) में बँट गई। परिवर्तनकारी नेताबाद में स्वराज्यवादी कहलाये। ये लोग असहयोग में विश्वास नहीं रखते थे। वे चुनाव में भाग लेकर विधानसभाओं में प्रवेश करना चाहते थे। स्वराज्यवादियों का नेतृत्व देशबंधु चितरंजनदास और मोतीलाल नेहरू ने किया। इन्होंने मार्च, 1923 ई. में स्वराज्य दल की स्थापना की। अपरिवर्तनकारी राजगोपालाचारी और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसके विरोधी थे।
2. राष्ट्रीय आंदोलन में स्वराज्य पार्टी की भूमिका (The Role of Swarajya Party
in Freedom Struggle) : स्वराज्य पार्टी ने 1923 ई. में होने वाले चुनावों में भाग लिया और
उसमें इस पार्टी ने अच्छी विजय प्राप्त की। इस पार्टी को केन्द्रीय विधानसभा में 101 स्थानों में
से 42 स्थानों पर विजय हासिल हुई। केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में रहकर स्वराज्य पार्टी ने
वायसराय से पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापना की माँग की। इसी के साथ इन्होंने बंगाल में दमनकारी अध्यादेशों की समाप्ति की भी मांग की और एक गोलमेज सम्मेलन बुलाने की माँग रखी। दल के नेता चाहते थे कि इस गोलमेज सम्मेलन में सभी वर्गों के भारतीय सम्मिलित हों और वे अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के लिए सुझाव दें तथा भारत के लिए एक संविधान भी बनाएँ। यह दल बार-बार केन्द्रीय विधानसभा का बहिष्कार करके अंग्रेजी सरकार की नीतियों का विरोध भी कर चुका था।
प्रांतीय विधानसभाओं में भी स्वराज्यवादी पार्टी को काफी अच्छी सफलता मिली थी। बंगाल
और मध्य भारत में पार्टी का काफी अच्छा प्रभाव था। इन दोनों राज्यों और अंग्रेजों की द्वैध शासन प्रणाली को ठप्प कर दिया था। उन्होंने न तो अपना मंत्रिमंडल बनाया, न अंग्रेजों का मंत्रिमंडल
बनाने दिया। उन्होंने अंग्रेजी शासन के काम में अडंगा लगाने की कोशिश की। इस कार्य में स्वराज्य पार्टी को काफी सफलता भी मिली। इस संबंध में एच. ए. ब्रेलफोर्ड ने कहा था कि द्वैध शासन प्रणाली अव्यवहार्य है। इसी पार्टी ने 1924 ई. में सबसे पहले गोलमेज सम्मेलन व भारत के लिए संविधान बनाने की मांग की थी। गोलमेज सम्मेलन की माँग 1930 ई. में मानी गई। इस पार्टी के दवाव के कारण ही अंग्रेजी शासन ने तुरंत साइमन कमीशन की नियुक्ति कर दी।
प्रश्न 7. सविनय अवज्ञा आंदोलन के आरंभ से लेकर 1934 में इसके वापस लेने तक
के बीच इसकी प्रगति का वर्णन कीजिए। अब तक के सबसे बड़े जन-संघर्ष के रूप में इसके
महत्व का आकलन कीजिए।
अथवा, सविनय अवज्ञा आन्दोलन पर टिप्पणी लिखें। [B.Exam.2012(A)]
उत्तर-सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1930 ई. में चलाया गया। इस आंदोलन के विभिन्न पक्षों
का वर्णन इस प्रकार है-
कारण : 1. 1928 ई. में साइमन कमीशन भारत आया। इस कमीशन ने भारतीयों के विरोध
के बावजूद भी अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी। इससे भारतीयों में असंतोष फैल गया।
2. सरकार ने नेहरू रिपोर्ट की शर्तों को स्वीकार न किया।
3. बारदोली के किसान आंदोलन की सफलता ने गाँधीजी को सरकार के विरुद्ध आंदोलन
चलाने के लिए प्रेरित किया।
4. गाँधीजी ने सरकार के सामने कुछ शर्ते रखीं, परन्तु वायसराय ने इन शर्तों को स्वीकार
न किया। इन परिस्थितियों में गाँधीजी ने सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ कर दिया।
आंदोलन की प्रगति (1930-31 ई.) (Progress of the Movement 1930-31
A.D.) : सविनय अवज्ञा आंदोलन गाँधीजी की डांडी यात्रा से आरंभ हुआ। उन्होंने 12 मार्च, 1930 ई० को पैदल यात्रा आरंभ की और 6 अप्रैल, 1930 ई. को डांडी के निकट समुद्र तट पर पहुंँचे। वहाँ उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाया और नमक कानून भंग किया। वहीं से यह आंदोलन सारे देश में फैल गया। अनेक स्थानों पर लोगों ने सरकारी कानूनों का उल्लंघन किया। सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए दमन-चक आरंभ कर दिया, परंतु आंदोलन की गति में कोई अंतर न आया। इसी बीच गाँधीजी और तत्कालीन वायसराय में एक समझौता हुआ। समझौते के अनुसार गाँधीजी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना तथा आंदोलन बंद करना स्वीकार कर लिया। इस तरह 1931 ई. में सविनय अवज्ञा आंदोलन कुछ समय के लिए रुक गया।
आंदोलन की प्रगति तथा अंत (1931-1934) (The progress and end of the
Movement): 1931 ई० में लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें कांग्रेस की ओर से गाँधीजी ने भाग लिया, परंतु इस सम्मेलन में भी भारतीय प्रशासन के लिए कोई उचित हल न निकल सका। गाँधीजी निराश होकर भारत लौट आए और उन्हें अपना आंदोलन फिर से आरंभ कर दिया। सरकार ने आंदोलन के दमन के लिए आंदोलनकारियों पर फिर से अत्याचार करने आरंभ कर दिए। सरकार के अत्याचारों से आंदोलन की गति कुछ धीमी पड़ गई अतः कांग्रेस ने 1933 ई० में इस आंदोलन को अधिकारिक रूप से स्थगित कर दिया। मई, 1934 में इसे वापस ले लिया गया।
आंदोलन का महत्व (Importance of the Movement) : सविनय अवज्ञा आंदोलन के
महत्वपूर्ण परिणाम निकले-(i) विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के कारण विदेशी कपड़े का आयात लगभग आधा रह गया। (ii) शराब की दुकानों के सामने किए गए सत्याग्रह से तथा शराबबंदी
के प्रचार से सरकार को मिलने वाली आय कम हो गई। (iii) भारतीयों को अपने लिए नमक बनाने की अनुमति मिल गई। (iv) किसानों, मजदूरों, आदिवासियों तथा महिलाओं में विशेष जागृति उत्पन्न हुई और वे स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न अंग बन गए। (v) सत्याग्रहियों द्वारा सहन किए गए ब्रिटिश अत्याचारों से लोगों में स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना और भी दृढ़ हो गई। (vi) ब्रिटिश साम्राज्यवाद एक बार फिर से डगमगा गया।
प्रश्न 8. द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रवैये का वर्णन कीजिए।
क्रिप्स मिशन की असफलता का विवेचन कीजिए।
उत्तर-1, कांग्रेस का द्वितीय युद्ध के प्रति दृष्टिकोण (Attitude of Congress
towards IInd World War) : दूसरा विश्व युद्ध सितंबर, 1939 ई. को प्रारंभ हुआ। भारत स्थित ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस के चुने हुए सदस्यों से परामर्श किए बिना फौरन युद्ध में शामिल हो गई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को फाँसीवादी आक्रमण के शिकार देशों से पूरी सहानुभूति थी। वह
फाँसीवाद विरोधी संघर्ष में लोकतांत्रिक शक्तियों की मदद करने को तैयार थी। मगर कांग्रेस के
नेताओं के समक्ष प्रश्न यह था कि एक गुलाम राष्ट्र का दूसरों के मुक्ति संघर्ष में साथ देना किस
प्रकार संभव था? इसलिए उन्होंने मांग की कि भारत को स्वाधीन घोषित किया जाये या
कम-से-कम भारतीयों को समुचित अधिकार दिए जायें, ताकि वे युद्ध में सक्रिय रूप से भाग
ले सकें। चूंकि सरकार ने इस अनुरोध को नहीं माना, इसलिए कांग्रेस ने अपने मंत्रिमंडलों को
आदेश दिया कि वे सब त्याग पत्र दे दें। अक्टूबर 1904 ई. में गाँधीजी ने कुछ चुने हुए व्यक्तियों
को साथ लेकर सीमित पैमाने पर सत्याग्रह चलाने का निर्णय लिया। 15 मई, 1941 ई. तक 25,000 से अधिक सत्यागही जेलों में ठूँसे जा चुके थे।
II. क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण (Causes of Crips Mission failure)-
(1) क्रिप्स प्रस्तावों के बहुत पहले कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की माँग की थी, परंतु क्रिप्स
प्रस्तावों ने भारत को केवल औपनिवेशिक स्वराज्य देने का आश्वासन दिया। क्रिप्स प्रस्तावों ने
औपनिवेशिक स्वराज्य के लिए कोई समय अथवा तिथि निश्चित नहीं की। यही कारण है कि
गाँधीजी ने क्रिप्स प्रस्तावों की आलोचना करते हुए कहा, “यह एक ऐसा चेक है जिस पर आगे
की तारीख पड़ी है और यह उस बैंक के नाम है जो जल्द ही दिवालिया होने वाला है।”
(2) वास्तव में क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार की एक चाल थी जिसके लिए
वह भारतीयों से अपने लिए पूर्ण समर्थन प्राप्त करना चाहती थी, क्योंकि इस समय ब्रिटिश सरकार को अनुभव हो रहा था कि भारतीयों के सहयोग के बिना वह जापानियों को हरा नहीं सकती थी।
युद्धकाल के उपरांत इन प्रस्तावों को लागू करने की ब्रिटिश सरकार की कोई मंशा नहीं थी।
(3) क्रिप्स प्रस्तावों में से एक प्रस्ताव यह भी था कि प्रांतों को जरूरत पड़ने पर पृथक्
संविधान बनाने का अधिकार प्राप्त होगा। इस प्रकार भारत के विभिन्न राज्यों को संविधान बनाने
का अधिकार देकर क्रिप्स प्रस्तावों ने भारत के सहस्रों टुकड़े करने की आधारभूमि तैयार कर दी।
इन प्रस्तावों को मान लेने का केवल एक ही अर्थ था कि भारत को हजारों टुकड़ों में बाँट देना।
(4) इस प्रकार, क्रिप्स प्रस्तावों से कोई भी भारतीय दल प्रसन्न नहीं था। भारत का सर्वप्रथम
दल कांग्रेस को इसकी आंतरिक नीतियों से असंतोष था। इन प्रस्तावों से भारत के खंड-खंड हो
जाने की आशंका थी और उसे पूर्ण स्वराज्य भी मिलने की आशा न थी। मुस्लिम लीग ने इसे इसलिए स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसमें स्पष्ट पाकिस्तान बनाए जाने की कोई बात नहीं की गई जबकि यह मुस्लिम लीग की प्रमुख माँग थी।
(5) राजनैतिक दलों द्वारा क्रिप्स प्रस्तावों को अस्वीकार करने का प्रमुख कारण यह भी था
कि इसमें दी गई संघीय व्यवस्था दोषपूर्ण थी; हिन्दू महासभा तथा कांग्रेस आदि सहमत न थे।
प्रश्न 9. भारत छोड़ो आंदोलन के कारण और परिणामों को लिखें।
                                             [B.M.2009A,B.Exam.2011,2013(A)]
उत्तर-भारत छोड़ो आंदोलन जिसका आरंभ 1942 ई० में हुआ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में
मील का पत्थर है। इसने कमजोर हो रही ब्रिटिश शक्ति को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन के महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित थे-
(i) द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण बढ़ती महँगाई और जरूरी वस्तुओं की कमी से जनता की
परेशानी। सरकार इन कमियों को दूर करने की जगह व्यर्थ में युद्ध में उलझी हुई थी जो कहीं
से भी भारतीयों के हित में नहीं था।
(i) क्रिप्स मिशन की असफलता-इस मिशन ने भारतीयों को पूर्ण स्वराज्य के बदले
होमिनियन स्टेटस देने की बात कह भारतीयों को निराश किया।
8 अगस्त 1942 ई० में बंबई में करो या मरो के नारे के साथ गाँधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन
का विगल फूंँका। जल्दी ही आंदोलन देश भर में फैल गया। प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिये गये
परंतु आंदोलन थमा नहीं।
इस आंदोलन का महत्वपूर्ण परिणाम रहा कि इसमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता थी।
इस आंदोलन के फलस्वरूप अधिराज्य की जगह पूर्ण स्वतंत्रता की मांग प्रबल हो गई। अब अंग्रेजों की नींव हिल चुकी थी और वे भारत छोड़ने की ओर अग्रसर होने लगे।
प्रश्न 10. भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए। किसी एक
राजनीतिक वर्ग का उल्लेख कीजिए जिसने इस आंदोलन का विरोध किया।
अथवा, भारत छोड़ो आंदोलन की प्रगति का विवरण दीजिए। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष
के इतिहास के संदर्भ में इसके महत्व का विवेचन कीजिए।
उत्तर-I. आंदोलन की विशेषताएँ (Features of the Movement): (1) मार्च, 1942
ई. में भारत में आए क्रिप्स मिशन की असफलता से भारत की जनता रुष्ट हो गई। इसको फाँसीवादी विरोधी शक्तियों के प्रति अभी भी पूरी सहानुभूति थी, मगर इससे लगता था कि देश की राजनीतिक स्थिति अब सहन नहीं हो सकती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वस्तुओं की कमी और बढ़ती कीमतों ने उसके असंतोष को और अधिक बढ़ा दिया था।
(2) अप्रैल-अगस्त, 1942 ई. के मध्यकाल में तनाव लगातार बढ़ता गया। जैसे-जैसे जापानी
सेनाएँ भारत की ओर बढ़ती गईं, वैसे-वैसे भारतीय जनता और नेताओं को जापानी विजय का
भय सताता रहा।
(3) गाँधीजी का जुझारूपन बढ़ने लगा। कांग्रेस ने अब निर्णय लिया कि अंग्रेजों से भारतीय
स्वाधीनता की माँग मनवाने के लिए सक्रिय उपाय किए जायें। अखिल भारतीय कांगेस कमेटी
की सभा 8 अगस्त, 1942 ई. को मुंबई में हुई, जिसमें भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया गया
तथा इस उद्देश्य को पाने के लिए गाँधीजी के नेतृत्व में एक अहिंसक जनांदोलन चलाने का निर्णय
लिया गया। गाँधीजी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया, परंतु सरकार ने सख्त कदम उठाया।
(4) आंदोलन चलने से पूर्व ही सरकार ने वज्रपात किया। 9 अगस्त को बहुत सवेरे गाँधीजी
और अन्य प्रमुख कांग्रेसी नेताओं को बंदी बनाकर अनजान जगह भेज दिया गया तथा कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
(5) इन गिरफ्तारियों ने पूरे देश को सकते में डाल दिया। स्थान-स्थान पर अनियंत्रित भीड़
ने प्रदर्शन, हड़तालों आदि का आयोजन किया। सरकार ने दमनचक तेजी से चला दिया। लोगों
पर लाठी प्रहार और गोलियों की वर्षा होने लगी। हजारों लोग हताहत हो गये। अतः कुद्ध भीड़
ने अपना गुस्सा रेलवे स्टेशनों, थानों, डाकघरों आदि को जलाकर निकाला। स्थान-स्थान पर
टेलीफोन के तार काट दिए गये तथा रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गईं। चारों ओर हिंसा का नग्न
नाच हो रहा था। सरकार ने बड़ी बेरहमी से आंदोलन को कुचल दिया।
(6) इस आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही-
(i) स्त्रियों ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
(ii) वे अंग्रेजों के विरुद्ध जुलूसों एवं धरनों के रूप में निकल पड़ी।
(iii) इस काल की प्रमुख महिला नेता थीं-अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी तथा मुंबई
 की ऊषा मेहता।
(iv) महिलाओं ने धन के अलावा अपने गहने भी राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूती देने के लिए
दान में दे दिए।
II. अंग्रेजों का दृष्टिकोण (Attitude of the English): ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को
कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 60229 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, भारत रक्षा कानून
में नजरबंद व्यक्तियों की संख्या 18,000 थी, पुलिस या सेना की गोली से मरे व्यक्ति 940 और
घायलों की संख्या 1630 थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने कहा, “गाँधीजी ने अहिंसा का मार्ग
त्याग दिया है।” लिनिलिथगो ने 31 अगस्त को चर्चिल को लिखा, “मैं यहाँ पर 1857 से गंभीर
विद्रोह को दबाने में व्यस्त हूँ।”
III. आंदोलन का महत्व (Importance of the Movement) : ‘भारत छोड़ो आंदोलन’
के कारण ब्रिटिश सरकार ने यह बात भलीभाँति जान ली कि जनता में असंतोष कितना व्यापक
है। सरकार समझ गई कि भारतीय जनता अंग्रेजी शासन से मुक्ति चाहती है और वह इसे प्राप्त
करके ही रहेगी। सरकार ने नि:संदेह आंदोलन को कुचल दिया, परन्तु वह स्वतंत्रता की भावनाओं को न कुचल सकी। परिणामस्वरूप इस आंदोलन की समाप्ति के तीन वर्षों के बाद ही उन्हें भारत को स्वतंत्र कर देना पड़ा।
प्रश्न 11. महात्मा गाँधी केवल राजनीतिक नेता ही नहीं थे, अपितु एक महान सामाजिक
तथा आर्थिक सुधारक भी थे। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-1. एक राजनीतिज्ञ के रूप में गाँधीजी की महानता तब झलकती है, जब उन्होंने अंग्रेजों
की साम्राज्यवादी शक्ति के विरुद्ध अहिंसक रूप से असहयोग आंदोलन तथा नागरिक अवज्ञा
आंदोलन चलाये तथा अंग्रेजी सत्ता को हिला कर रख दिया।
2. उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित की तथा भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट
किया। उसका उदाहरण खिलाफत आंदोलन के साथ असहयोग आंदोलन को जोड़ना था।
3. एक सामाजिक सुधारक के रूप में उन्होंने जातीय व्यवस्था का विरोध किया। उन्होंने
यथासंभव हरिजनों का उद्धार किया तथा पहली बार अछूतों को ‘हरिजन’ नाम दिया। उनके लिए ‘हरिजन’ नामक पत्रिका निकाली गई।
4. वे छुआछूत के विरुद्ध लड़े। सभी वर्गों एवं धर्मों से सौहार्द्रपूर्ण संबंधों को बढ़ाने के लिए
बल दिया।
5. आर्थिक सुधार के रूप में गाँधीजी ने चरखा और खादी का प्रयोग करने पर बल दिया,
जिससे देशी कपड़ा उद्योगों को बल मिला।
6. गाँवों के विकास और कुटीर उद्योग-धंधों को बढ़ावा देने पर बल दिया, जिन्हें छोटी-सी
पूँजी से परिवार के सदस्य घर से ही चलाकर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते थे।
7. उन्होंने अहमदाबाद के मिल मजदूरों को अपने वेतन बढ़ाने के लिए संघर्ष करने के लिए कहा।
8. भारत में सभी वर्गों में आर्थिक समानता लाने पर बल दिया।
9. वे किसानों के अधिकारों के लिए लड़े तथा उनके हितों की रक्षा के लिए आगे आए।
प्रश्न 12. महात्मा गाँधी का भारत की स्वतंत्रता लाने में कहाँ तक योगदान था ?
                                                                  [B.Exam.2012,2013 (A)]
अथवा, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के योगदान का वर्णन करें।
                                                                           [B.Exam.2010 (A)
अथवा, स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी की भूमिका पर प्रकाश डालें।
                                                                          [B.Exam.2011 (A)]
उत्तर-भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में जितना योगदान गाँधीजी का था, निश्चित रूप से किसी
अन्य भारतीय का नहीं था। यदि गाँधीजी को स्वाधीनता संघर्ष की धुरी कहा जाये तो कोई
अतिश्योक्ति न होगी। सन् 1919 से 1947 तक वे भारत की राजनीति पर इस प्रकार छाये रहे
कि बहुत से इतिहासकारों ने इस काल को ‘गाँधी युग’ का नाम दिया है। देश के स्वतंत्रता संग्राम
में सक्रिय भाग लेते हुए उन्होंने अन्य नेताओं का मार्गदर्शन भी किया। उन्होंने अहिंसा की नीति
अपनाकर शांतिपूर्ण ढंग से शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार को झुका दिया। गाँधीजी ने असहयोग
आन्दोलन, सत्याग्रह आन्दोलन, सविनय आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन, स्वदेशी आन्दोलन आदि बड़े शान्तिपूर्ण ढंग से चलाये। हिन्दू-मुस्लिम एकता को कायम रखने के लिए भरसक प्रयत्न किये जिससे अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति सफल न हो सकी।
गाँधीजी ने अपने प्रिय देश भारत के लिए अपना तन-मन-धन सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
देश को स्वतंत्र कराने के लिए अंग्रेजी सरकार की लाठियाँ-गोलियाँ खानी पड़ी, अनेक बार जेल
गये, अनेक यातनाएँ तथा अत्याचार सहन किये परन्तु आजादी का वह दीवाना अपने निश्चय पर
अटल रहा। प्रसिद्ध डांडी यात्रा के समय उन्होंने अपने सहयोगियों से बड़े जोरदार शब्दों में कहा था:
“हम मातृभूमि के सैनिक हैं, आजादी के मतवाले हैं।
बलिदेवी पर हँस-हँस करके, निज शीश चढ़ाने वाले हैं।”
उन्होंने विभिन्न आंदोलनों का कुशल नेतृत्व किया जिनका विवरण निम्नलिखित है :
(1) असहयोग आंदोलन (Non-Co-operation Movement): जब कभी भी अंग्रेजी
सरकार ने भारत के लोगों के हितों की अनदेखी की, गाँधीजी ने सदैव लोगों को कहा कि वे अंग्रेजों को सहयोग न दें। उनका विचार था कि यदि भारतीय अंग्रेजों का साथ नहीं देंगे तो अंग्रेजी सरकार यहाँ कैसे टिक सकेगी। उनके कहने पर अनेक भारतीयों ने चाहे वे क्लर्क थे, वकील थे या कारीगर सबने अपना काम करना छोड़ दिया। विद्यार्थियों ने अपनी कक्षाओं में जाना बंद कर दिया। फिर सभी वर्ग स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े।
(2) सविनय अवज्ञा आन्दोलन (Civil Disobedience Movement): 1928 में
साइमन कमीशन भारत आया। भारतीयों के विरोध के बावजूद कमीशन ने अपनी रिपोर्ट पेश कर
दी। इस पर गाँधीजी ने निराश होकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। गाँधीजी ने नमक कानून को तोड़ा, इस पर गाँधीजी को अपने सहयोगियों के साथ जेल जाना पड़ा। सन् 1934 में यह आंदोलन समाप्त हो गया।
(3) भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement): सन् 1942 में गाँधीजी ने
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन चलाया। अंग्रेजों ने इसे दबाना चाहा परन्तु वह भारतीय जनता की आवाज को न दबा सके। गाँधीजी ने पूर्ण आशा एवं विश्वास से कहा :
या तो होगा भारत स्वतंत्र, कुछ दिवस-रात के प्रहरों पर।
या शव बन लहरेगा शरीर, मेरा समुद्र की लहरों पर।”
(4) सत्याग्रह आंदोलन (Styagraha Movement) : महात्मा गाँधी का प्रथम हथियार
अहिंसा था तथा दूसरा बड़ा हथियार सत्याग्रह आंदोलन था। अपनी बात को मनवाने के लिए
महात्मा गाँधी धरना देते थे, या कुछ दिन का उपवास रख लेते थे या अपना विरोध प्रकट करने
के लिए ऐसा कोई और ढंग अपना लेते थे। कई बार वे मरण व्रत भी रख लेते थे। इन बातों
से जहाँ सारे विश्व का ध्यान भारत की ओर आकर्षित हो जाता था, वहाँ अंग्रेजी सरकार भी काँप
उठती थी।
(5) अहिंसा (Non-Violence) : अपनी बात को मनवाने के लिए महात्मा गाँधी किसी
लड़ाई-झगड़े या ईंट का जवाब पत्थर से देने की नीति पर विश्वास नहीं करते थे। वे सारे कार्य
शांति से करने में विश्वास रखते थे। वे जानते थे कि अंग्रेजी सरकार के पास बड़ी शक्ति है और
भारतीय लोग शक्ति से उसका मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए अंग्रेजी सरकार को जीतने के
लिए उन्होंने अहिंसा और शांति की नीति अपनाई। इस नीति के सामने अंत में अंग्रेजी जैसी
शक्तिशाली सरकार को भी झुकना पड़ा।
(6) स्वदेशी आंदोलन (Swadeshi Movement): अंग्रेजों को भारत से निकालने के
लिए महात्मा गाँधीजी ने एक अन्य हथियार निकाला। वह हथियार था स्वदेशी आंदोलन। वे अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेज एक व्यापारिक जाति है और वे भारत में व्यापारी बनकर ही आए थे। यदि उन्हें भारत में व्यापारिक लाभ नहीं रहेगा तो वह स्वयं ही भारत छोड़ जाएँगे। इसलिए महात्मा गाँधी ने अपने देशवासियों को बाहरी माल का बहिष्कार करने की सलाह दी। उनके कहने पर ही भारतीयों ने जहाँ विदेशी माल का प्रयोग बंद कर दिया, वहीं उन्होंने विदेशी माल की होली भी जलाई। अब जब अपने देश की चीजें प्रयोग होने लगी तो भारतीय कारखाने चलने लगे। भारतीय मजदूरों को काम मिलने लगा और भारत का पैसा भारत में ही रहने लगा। इस तरह भारत की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।
(7) हिन्दू-मुस्लिम एकता (Hindu-Muslim Unity) : अंग्रेजों ने भारतीयों को एक-दूसरे से
अलग रखने के उद्देश्य से कई प्रयास किए, परन्तु गाँधीजी उन्हें एकजुट रखने का प्रयास करते रहे।
प्रश्न 13. असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध कैसे था ? (T. B.Q.6)
उत्तर-(i) असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध था। यह गाँधीजी द्वारा ब्रिटिश सरकार
पर थोपे गए रॉलेक्ट एक्ट जैसे काले कानून को वापस लिए जाने के लिए जन आक्रोश और
प्रतिरोध अभिव्यक्ति का लोकप्रिय माध्यम था।
(ii) असहयोग आंदोलन इसलिए भी प्रतिरोध आंदोलन था क्योंकि राष्ट्रीय नेता उन अंग्रेज अधिकारियों को कठोर दंड दिलाना चाहते थे जो अमृतसर के शांतिपूर्ण जालियाँवाला बाग में हुए
प्रदर्शनकारियों और जलसे में भाग लेने वालों पर अत्याचार, हत्याओं और अनेक लोगों को भयंकर रूप से घायल करने के लिए उत्तरदायी थे। उन्हें सरकार ने कई महीनों के बाद भी किसी प्रकार का दंड नहीं दिया था।
(iii) असहयोग आंदोलन इसलिए भी प्रतिरोध था क्योंकि यह खिलाफत आंदोलन कार्यों के
साथ सहयोग करके देश के दो प्रमुख धार्मिक समुदायों-हिन्दू और मुसलमानों को मिलाकर
औपनिवेशिक शासन के साथ जनता के असहयोग को अभिव्यक्त करने का माध्यम था।
(iv) असहयोग आंदोलन इसलिए भी प्रतिरोध था ताकि विदेशी शिक्षा संस्थाओं और सरकारी
विद्यालयों और कॉलेजों से बाहर विद्यार्थियों, शिक्षकों का आह्वान किया जाए और जो विभिन्न
स्थानों पर राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाएँ बनाई गई थीं उनमें विद्यार्थियों और शिक्षकों को अध्ययन और
अध्यापन करने-कराने के लिए प्रेरित किया जाए ताकि सरकारी या विदेशी सत्ता को शांतिपूर्ण,
अहिंसात्मक प्रतिरोध के माध्यम से उखाड़े जाने के लिए वातावरण बनाया जा सके।
(v) असहयोग आंदोलन ने सरकारी अदालतों का बहिष्कार करने के लिए भी सर्व-साधारण
और वकीलों को कहा। गाँधीजी के आह्वान पर वकीलों में अदालतों में जाने से मना कर दिया।
(vi) इस व्यापक लोकप्रिय प्रतिरोध का प्रभाव अनेक कस्बों और नगरों में कार्यरत श्रमिक
वर्ग पर भी पड़ा, वे हड़ताल पर चले गए। जानकारों के अनुसार सन् 1921 में 396 हड़तालें हुई
जिनमें 6 लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 30 लाख कार्य दिवसों की हानि हुई।
(vii) असहयोग आंदोलन का प्रतिरोध देश के ग्रामीण क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा था। उदाहरण
के लिए उत्तरी आंध्र की पहाड़ी जन-जातियों ने वन्य कानूनों की अवहेलना कर दी। अवध के
किसानों ने कर नहीं चुकाया। कुमाऊँ के किसानों ने औपनिवेशिक अधिकारियों का सामान ढोने
से साफ मना कर दिया। इन विरोधी आंदोलनों को कभी-कभी स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवज्ञा करते हुए कार्यान्वित किया गया।
संक्षेप में किसानों, श्रमिकों और अन्य लोगों ने इस प्रतिरोध आंदोलन की अपने ढंग से व्याख्या
की और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के साथ असहयोग के लिए गाँधीजी और अन्य ऊपर समझे जाने वाले नेताओं से प्राप्त निर्देशों पर टिक कर रहने की वजह अपने हितों से मेल खाते तरीकों का प्रयोग कर कार्यवाही की।
प्रश्न 14. गोलमेज सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
                                                                                 (NCERT T.B.Q.7)
उत्तर-ऐतिहासिक रिकार्ड के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने 1930 से लेकर 1931 तक गोलमेज
सम्मेलनों का आयोजन किया था।
पहली गोलमेज वार्ता लंदन में नवम्बर 1930 में आयोजित की गई थी जिसमें देश के प्रमुख
नेता शामिल नहीं हुए। इस कारण अंततः यह बैठक निरर्थक साबित हुई। इस गोलमेज की विफलता पर भारतीय इतिहास के विख्यात विद्वान लेखक प्रोफेसर विपिन चंद्र कहते हैं कि “गाँधीजी लोगों के हृदय पर भगवान राम की तरह उस समय राज करते थे। जब राम ही लंदन में होने वाली सभा में नहीं पहुँचे तो रामलीला कैसे हो सकती थी।” सरकार भी जानती थी कि बिना प्रमुख नेताओं के लंदन में गोलमेज बुलाना निरर्थक होगा।
सरकार ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की तैयारी शुरू की। वायसराय लार्ड इर्विन ने जनवरी
1931 में ही महात्मा गाँधी को जेल से रिहा कर दिया। अगले ही महीने वायसराय इर्विन के साथ गाँधीजी की कई लंबी बैठकें हुईं। इन्हीं बैठकों के बाद गाँधी-इर्विन समझौते पर सहमति बनी
जिसकी शर्तों से सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेना, सारे कैदियों की रिहाई और तटीय क्षेत्रों में नमक उत्पादन की अनुमति देना शामिल थी। रैडिकल राष्ट्रवादियों ने इस समझौते को द्वितीय गोलमेज की तैयारी के लिए सही वातावरण तैयार करने वाला नहीं मानकर गाँधीजी की भी कटु आलोचना की क्योंकि ब्रिटिश सरकार से भारतीयों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का आश्वासन हासिल करने में गाँधीजी विफल रहे थे। यहाँ हमें याद रखना चाहिए सन् 1929 के लाहौर में रावी नदी के किनारे पर हुए वार्षिक अधिवेशन में कांग्रेस और राष्ट्रवादियों ने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का लक्ष्य घोषित कर दिया था। गाँधीजी को इस संभावित और घोषित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल वार्ताओं का आश्वासन मिला। वस्तुतः भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन को जारी हुए लगभग 46 वर्ष (1885-1931) हो चुके थे। अब लोग पूर्ण स्वतंत्रता का वायदा विदेशी सरकार से चाहते थे।
                     चित्र : दूसरा गोलमेज सम्मेलन, लंदन, नवंबर 1931
जो भी हो दूसरा गोलमेज सम्मेलन 1931 के आखिर में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में
आयोजित हुआ। उसमें महात्मा गाँधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से प्रतिनिधित्व और नेतृत्व कर रहे थे। गाँधीजी का कहना था उनकी पार्टी पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। इस दावे को तीन पार्टियों ने खुली चुनौती दे दी।
(i) मुस्लिम लीग का इसे इस संदर्भ में कहना था वह भारत मुस्लिम अल्पसंख्यकों के
हित में काम करती है।
(ii) भारत के 556 रजवाड़ों का दावा था कि कांग्रेस का उनके नियंत्रण वाले भू-भाग पर
कोई अधिकार नहीं था।
(iii) तीसरी चुनौती डॉ. भीमराव अंबेडकर की तरफ से थी जो बहुत बड़े वकील और
विचारक थे। उन्होंने कहा कि वह दलितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महात्मा गाँधी और कांग्रेस
पार्टी देश में तथाकथित दलित समझी और कही जाने वाली नीची जातियों का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं करते।
परिणाम यह हुआ कि हर दल और नेता अपने-अपने पक्ष, विचार, तर्क और माँगें रखते रहे
जिसका कुल मिलाकर नतीजा शून्य के रूप में सामने आया। गाँधीजी जैसे ही जहाज से बंबई
उतरे तो उन्होंने कहा कि मैं खाली हाथ लौट आया हूँ और सरकार के अड़ियल रवैये के बाद
हमें दुबारा से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करना पड़ेगा और उन्होंने ऐसा ही किया।
भारत में नए वायसराय लार्ड विलिंग्डन को गाँधीजी से विल्कुल हमदर्दी नहीं थी। उसने एक
निजी पत्र में स्पष्ट रूप से इस बात की पुष्टि की थी।
विलिंग्डन ने लिखा था कि “अगर गाँधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत होती।
वह जो भी कदम उठाता है उसे ईश्वर की प्रेरणा का परिणाम कहता है लेकिन असल में उसके
पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल होती है। देखता हूँ कि अमेरिको प्रेस से गजब का आदमी बताती है। लेकिन सच यह है कि हम निहायत अव्यावहारिक, रहस्यवादी और अंधविश्वासी जनता के बीच रह रहे हैं जो गाँधी को भगवान मान बैठी है….”
इसी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन तीसरे और अंतिम चरण में अगस्त 1933 से 9 महीने
तक चलता रहा। गाँधीजी सहित अनेक प्रमुख नेता बंदी बना दिए गए। 1934 में निरुत्साहित जनता को देखकर गाँधीजी ने इस आंदोलन का अंत घोषित किया।
तीसरा गोलमेज सम्मेलन : भारत में जिन दिनों गाँधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन
चलाया जा रहा था, ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीसरी गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई। इंग्लैंड की लेबर
पार्टी ने इसमें भाग लिया। कांग्रेस पार्टी ने भी कांफ्रेंस का बहिष्कार किया। कुछ भारतीय
प्रतिनिधि, जो सरकार की हाँ में हाँ मिलाने वाले थे उन्होंने इस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन
में लिए गए निर्णयों को श्वेत-पत्र (White Paper) के रूप में प्रकाशित किया गया और फिर
इसके आधार पर 1935 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास किया गया।
प्रश्न 15. पृथक् निर्वाचिका पर डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का लगभग 250
शब्दों में उल्लेख कीजिए।
उत्तर-पृथक् निर्वाचिका पर डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचार (Thoughts of Dr.
Bhim Rao Ambedkaron Separate Electorate):
(i) दलित वर्गों के लिए पृथक् निर्वाचिका के प्रस्ताव पर गाँधीजी की दलीलों (तर्क) के उत्तर
में डॉ. अंबेडकर ने लिखा-
“हम समक्ष एक ऐसा वर्ग है जो निश्चय ही अस्तित्व संघर्ष में स्वयं को कायम नहीं रख
सकता। जिस धर्म से भी लोग बँधे हुए हैं वह उन्हें सम्मानजनक स्थान प्रदान करने की बजाय
उन्हें कोढ़ियों की तरह रखता है जिनके साथ सामान्य संबंध नहीं रखे जा सकते हैं।”
(ii) डॉ. अंबेडकर के अनुसार दलित वर्ग आर्थिक दृष्टि से ऐसा वर्ग है जो दो वक्त की
रोटी के लिए सवर्ण (उच्चवर्गीय) हिन्दुओं पर पूरी तरह अवलंबित (आश्रित) है। जिसके पास
आजीविका (रोजी-रोटी) कमाने का कोई साधन नहीं है।
(iii) डॉ. भीमराव इस संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए आगे कहते हैं कि न केवल
हिन्दुओं में सामाजिक पूर्वाग्रहों (Social biases) के कारण उनके लिए रास्ते बंद हैं अपितु संपूर्ण इतिहास में हिन्दू समाज ने उनके सामने खुलने वाली प्रत्येक संभावना (Possibility) को बंद कर दिया है जिससे दलित वर्गों को जीवन में ऊपर उठने का कोई मौका न प्राप्त हो सके।
(iv) डॉ. अंबेडकर अपने विचारों के पक्ष में निष्पक्ष सोच रखने वाले व्यक्तियों का आह्वान
करते हुए कहते हैं, समाज की इस विषम और अन्यायपूर्ण स्थितियों में सभी निष्पक्ष सोच वाले
व्यक्ति इस बात पर सहमत होंगे कि आज (अर्थात्) स्वतंत्रता से पूर्व सबसे बड़ी जरूरत यही
है कि ऐसे अपंग समुदाय (Handicapped community) के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का एक
मात्र रास्ता यही है कि उसे राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त हो जिससे वह (दलित वर्ग) अपनी रक्षा कर सके।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि डॉ. अंबेडकर तथाकथित दलित वर्ग के मसीहा के
रूप में उभरे जिसका सम्मान स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भी किया।
प्रश्न 16 महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
                                                                                  (NCERT T.B.Q.8)
उत्तर-गाँधीजी स्वदेश आए और 1915 से लेकर जनवरी 1948 तक अपने दर्शन और
विचारधारा से लोगों को विभिन्न माध्यमों से अवगत कराते रहे। उनके दर्शन के मुख्य सिद्धांत
अथवा आधारभूत स्तंभ थे-(i) सत्याग्रह, (ii) अहिंसा, (iii) शांति, (iv) दरिद्रनारायणों के प्रति
सच्ची हमदर्दी, (v) महिलाओं का सशक्तिकरण, (vi) साम्प्रदायिक सद्भाव, (vii) भारतीय ग्रामीण क्षेत्र एवं उनमें रहने वाले लोगों के हितों के बारे में सोचना, करना और लोगों को प्रेरणा देना, (viii) अस्पृश्यता का विरोध करना लेकिन हिन्दू समाज की एकता को बनाए रखने के लिए
पृथक्कीकरण का विरोध, (ix) लक्ष्य और माध्यम दोनों की श्रेष्ठता पर बल देना,
(x) कल्याणकारी कार्यक्रमों, (xi) कुटीर उद्योग धंधों, (xii) चरखा, खादी आदि को अपनाने पर बल देना, (xiii) रंगभेद और जाति भेदभाव का विरोध करना, (xiv) स्वयं सर्वसाधारण की वेशभूषा, यथासंभव सामान्य लोगों की भाषा-बोली को अपनाना, साधारण भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी भाषा में लिखना।
(ख) गाँधीजी ने भारत आने से पहले ही दक्षिण अफ्रीका में अन्याय के विरुद्ध आवाज
उठाई। उन्होंने मानववाद, समानता आदि के लिए प्रयास किए तथा रंग भेदभाव, जाति भेदभाव
के विरुद्ध सत्याग्रह किया और विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त की।
(ग) जब वह 1915 में स्वदेश लौटे तो उस समय कांग्रेस पार्टी वास्तव में मध्यवर्गीय शिक्षित
लोगों की पार्टी थी और उसका प्रभाव कुछ शहरों और कस्बों तक सीमित धा। गाँधीजी भली-भाँति जानते थे कि भारत गाँवों का देश है और इस राष्ट्र की शक्ति ग्रामीण लोगों, श्रमिकों, सर्वसाधारण, महिलाओं, युवाओं आदि में निहित है। जब तक ये सभी लोग राष्ट्रीय संघर्ष में नहीं जुड़ेंगे तब तक ब्रिटिश सत्ता को शांतिपूर्ण, अहिंसात्मक आंदोलनों, सत्याग्रहों, प्रदर्शनों, लेखों आदि से हटाना मुश्किल था।
(घ) गाँधीजी ने अपने भाषणों, पत्र-पत्रिकाओं में लिखे लेखों, पुस्तकों आदि के माध्यम
से औपनिवेशिक सत्ताधारियों को यह जता दिया कि भारत में जो सर्वत्र दरिद्रता, भुखमरी, निम्न
जीवन स्तर, अशिक्षा, अंधविश्वास और सामाजिक फूट देखने को मिलती है उसके लिए ब्रिटिश
शासन ही उत्तरदायी है क्योंकि अंग्रेजों ने वर्षों से भारत का न केवल राजनैतिक शोषण किया
है बल्कि इसका आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शोषण भी किया है।
(ङ) गांँधीजी जानते थे कि जब तक वह किसानों, मजदूरों और सर्वसाधारण के प्रति
सरकार, जमींदार, साहूकार, ताल्लुकदारा आदि के द्वारा किए जा रहे अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएँगे तब तक यह सभी वर्ग के लोग उन्हें अपने में से एक नहीं समझेंगे और वे उनके आह्वान पर तुरंत शामिल नहीं होंगे। इसलिए गाँधीजी ने चम्पारण में नील के खेतों में
काम कर रहे गरीब किसानों, अहमदाबाद के वस्त्र-मिलों में काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी
बढ़ाने और खेड़ा जिले के किसानों पर प्राकृतिक विपत्तियों के बावजूद, ऊँचे भू-राजस्व और
कठोरता से की जा रही राजस्व वसूली के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई। वे अपने सभी अनुयायियों एवं राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को बड़े सरल ढंग से समझा देते थे कि हम हिंसा या ताकत के बल पर ब्रिटिश सत्ता का सामना नहीं कर सकते लेकिन यदि हम बात अहिंसात्मक ढंग से शांतिपूर्वक, सत्याग्रह और प्रतिरोध के द्वारा अपना रोष प्रकट करके अभिव्यक्ति करेंगे तो निसंदेह इंग्लैंड के सभी प्रबुद्ध, न्यायप्रिय, उदार, मानवतावादी, लोकतंत्र समर्थक नागरिक भारतीय पक्ष को समझेंगे और भारतवासियों को स्वराज्य प्राप्त होगा। वस्तुतः 1915 और 1921 के मध्य ही थोड़े से सेवकों से ही गाँधीजी को राष्ट्रीय आंदोलन का मुखड़ा, महलों की जगह झोंपड़ियों, शहर की जगह गाँव और मध्यमवर्ग तक सीमित आंदोलन को सर्व-साधारण तक प्रसारित करने में सफलता प्राप्त हुई।
गाँधीजी हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते थे। वे कहते थे कि दोनों संप्रदाय के लोग उनकी
दायीं और बायीं आँख के समान हैं। जैसे कोई मानव अपनी आँखों में भेदभाव नहीं करता, उसी
प्रकार वह भी हिन्दू और मुसलमानों में कोई भेदभाव नहीं करते थे।
गाँधीजी पुरुष और स्त्री को समान मानते थे। वह नारी को महान होने के साथ-साथ एक
बड़ी शक्ति के रूप में देखते थे। उन्होंने उनके हितों की बात की, उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल
होने, चरखा कातने, खादी का प्रचार करने, नशाबंदी और शराबबंदी का विरोध करने के
साथ-साथ उन दुकानों पर धरना देने के लिए आह्वान किया जो शराब, विदेशी कपड़े, विदेशी
सामान आदि बेचती थी। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा, ग्राम पंचायतों का समर्थन किया। गाँधीजी ने समाज के दलित वर्ग को न्याय दिलाने के लिए उन्हें ‘हरिजन’ नाम दिया। उनके हृदय और मस्तिष्क में उनके प्रति किसी भी प्रकार का द्वेष या गलत विचार नहीं थे। उन्होंने ‘हरिजन’ नाम से एक पत्र भी निकाला। उन्होंने साबरमती आश्रम में स्वयं अपने हाथों से वे कार्य किए जिन्हें प्रायः संकीर्ण मानसिकता के लोग गंदा काम कहकर तिरस्कार करते थे। वह काम को ईश्वर-आराधना के तुल्य मानते थे और अस्पृश्यता को व्यवहार में लाने के कार्य को मानवता और ईश्वर के विरुद्ध
अपराध समझते थे। गाँधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और पुराने ऑटोमन साम्राज्य की मांगों को असहयोग आंदोलन से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया। जब कभी भी देश में धार्मिक घृणा अथवा दंगे हुए उन्होंने कई बार आमरण अनशन किया, दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया और अपने प्रभाव और व्यक्तित्व का प्रयोग सभी सम्प्रदाय के लोगों और नेताओं को समझाने के लिए इस्तेमाल किया।
प्रश्न 17. निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता
है ? ये स्रोत सरकारी ब्यौरों से तरह भिन्न होते हैं ?
उत्तर-निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में निम्न तथ्यों का पता चलता है:
(i) जिस भाषा में पत्र और आत्मकथा लिखी जाती है उससे संबंधित उस व्यक्ति की
जानकारी के बारे में हमें पता चलता है। उसको पढ़कर हम उन व्यक्तियों के भाषा स्तर आदि को भी जान सकते हैं।
(ii) आत्मकथाएँ व्यक्ति के संपूर्ण जीवनकाल, जन्मस्थान, उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि,
शिक्षा, व्यवसाय, रुचियों, प्राथमिकताओं, कठिनाइयों, जीवन में आए उतार-चढ़ाव, जीवन से जुड़ी घटनाओं आदि के बारे में भी बताती हैं।
(iii) निजी पत्र राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जवाहरलाल को नेहरू
लिखे उसमें उन्होंने कांग्रेस के कार्यक्रम, उसकी प्राथमिकताएँ आदि के बारे में जानकारी दी। इसी
तरह जो निजी पत्र जवाहरलाल ने महात्मा गाँधी को लिखे उनमें भी विभिन्न नेताओं, अपने विचार, कार्यक्रम, कार्यक्षमता आदि की जानकारी दी। गाँधीजी ने जो पत्र व्यक्तिगत तौर पर जवाहरलाल नेहरू या अन्य लोगों को लिखे उनसे हमें पता लगता है कि एक पार्टी के रूप में कांग्रेस के आदर्श किस तरह विकसित हुए। समय-समय पर उठने वाले आंदोलनों में गाँधीजी ने क्या भूमिका निभाई। इनसे कांग्रेस की आंतरिक प्रणाली तथा राष्ट्रीय आंदोलन के बारे में विभिन्न नेताओं के दृष्टिकोण के बारे में जानकारी मिलती है।
(iv) विभिन्न क्षेत्रों से विभिन्न नेताओं, संगठनों के द्वारा लिखे गए पत्रों के माध्यम से मिली
जानकारियाँ, सरकार के दृष्टिकोण व्यवहार, राष्ट्रीय नेताओं को जेलों में सामना करने वाली
परिस्थितियाँ, आंतरिक दशाएँ आदि के बारे में भी जानकारी मिलती है।
(v) सरकारी ब्यौरों से स्रोतों के रूप में निजी पत्र और आत्मकथाएँ पूरी तरह भिन्न होती
हैं। सरकारी ब्यौरे प्रायः गुप्त रूप से लिखे जाते हैं। ये लिखाने वाली सरकार और लिखने वाले
विवरणदाता या लेखकों के पूर्वाग्रहों, नीतियों, दृष्टिकोणों के बीच में आपसी संबंध, विचारों के
आदान-प्रदान और निजी स्तर से जुड़ी सूचनाएँ देने के लिए होते हैं। किसी भी व्यक्ति की
आत्मकथा उसकी ईमानदारी, निष्पक्षता और सच्चे विवरण पर उसका मूल्य निर्धारित करती है।
प्रश्न 18. असहयोग आंदोलन की प्रकृति एवं परिणामों का वर्णन करें। [B.Exam.2011 (A)]
उत्तर-कांग्रेस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू करने का
फैसला किया। यह सचमुच एक क्रांतिकारी कदम था। इस आंदोलन का स्वरूप राष्ट्रीय था। यह
देश का प्रथम जन-आंदोलन था। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक उस आंदोलन का
प्रसार था। पहली बार सभी धर्मों, जातियों के लोगों ने एक साथ आंदोलन में भाग लिया। स्त्रियों
की भागीदारी उस आंदोलन की एक अन्य विशेषता है। सरकारी वस्तुओं का बहिष्कार करना शान का विषय बन गया था। जेल जाना आम बात हो गई थी। कांग्रेस की प्रवृत्ति में भी बदलाव आया एवं संवैधानिक उपायों की प्रासंगिकता समाप्त हो गयी। जनता में संघर्ष करने का नया जोश पैदा हुआ। संपूर्ण देश में जनता ने बड़े ही उत्साह के साथ उसमें भाग लिया।
आंदोलन के परिणाम :
इस आंदोलन के दूरगामी परिणाम सिद्ध हुए :
(i) यह एक जन आंदोलन था। इसमें बड़े-से-बड़े और छोटे-से-छोटे व्यक्ति ने भाग लिया।
(ii) स्वदेशी आंदोलन विशेष रूप से खादी, चरखे से आत्मा विश्वास की भावना का विकास
हुआ।
(iii) उस आंदोलन में सभी पक्षों पर, जिनमें शिक्षा, आर्थिक व सामाजिक, इन सभी पर समान जोर दिया गया था।
(iv) ब्रिटिश सरकार का भय अब जनता के मन से निकल गया।
(v) पहली बार महिलाओं ने जोरदार ढंग से राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी उपस्थित दर्ज करायी।
जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में, “गाँधीजी के असहयोग आंदोलन ने आत्मनिर्भरता तथा
शक्ति संचय का पाठ पढ़ाया। सरकार भारतीयों के ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक सहयोग पर निर्भर
करती है और यह सहयोग नहीं दिया गया तो सरकार का सम्पूर्ण ढाँचा कम से कम सिद्धान्त,
लड़खड़ा जाएगा। सरकार पर दबाव डालने का यह प्रभावशाली ढंग है। यही कारण था कि
असहयोग का कार्यक्रम और गाँधी जी की असाधारण प्रतिभा ने देशवासियों को अपनी ओर
आकर्षित किया और उनमें आशा का संचार किया।”
प्रश्न 19. क्या भारत का विभाजन अनिवार्य था? स्पष्ट करें। [B.Exam.2010(A)]
उत्तर-भारत की स्वतन्त्रता चाहने वाले राष्ट्रभक्तों को विभाजन के अभिशाप के साथ
स्वतन्त्रता मिली। खिलाफत आन्दोलन के नेता महात्मा गाँधी, रतौना आन्दोलन के नेता भाई अब्दुल गनी एवं माखनलाल चतुर्वेदी ने कभी सोचा भी न होगा कि उन्हें हिन्दु-मुस्लिम दंगों का यह रूप भी देखना पड़ेगा। इस विभाजन को अभी लगभग 66 वर्ष हुये हैं, आज भी कुछ ऐसे बुजुर्ग मौजूद हैं जिन्होंने इन दंगों को देखा एवं सहा है। कुछ ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जिन्होंने अपने पिता, दादा व नाना से उनके दंगों के बारे में अनुभवों को सुना है। प्रत्येक स्रोत लेखबद्ध नहीं होता, कुछ तथ्य मौखिक रूप से लोगों की जबान द्वारा सुने जाते हैं। अतः हम ऐसे लोगों से साक्षात्कार कर तत्युगीन स्थिति का अध्ययन कर सकते हैं। इस प्रकार मौखिक जानकारी का भी यदि वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जाये तो वह भी इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती है।
प्रश्न 20. गोलमेज सम्मेलन क्यों आयोजित किए गए थे? इनके कार्यों की विवेचना
कीजिए।                                              [B.Exam.2010,2013 (A)]
उत्तर-12 नवम्बर, 1930 ई० में प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन की
अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड ने की। इस सम्मेलन में 89 प्रतिनिधियों ने भाग
लिया। इसमें ब्रिटेन के तीनों दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले 16 ब्रिटिश संसद सदस्य, ब्रिटिश
भारत के 57 प्रतिनिधि जिन्हें वायसराय ने मनोनीत किया था तथा देशी रियासतों के 16 सदस्य
सम्मिलित थे। कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया था। कांग्रेस की अनुपस्थिति पर
ब्रेल्सफोर्ड ने कहा “सेन्ट जेम्स महल में भारतीय नरेश, हरिजन, सिक्ख, मुसलमान, हिन्दू, ईसाई
और जमींदारों, मजदूर संघों और वाणिज्य संघों सभी के प्रतिनिधि इसमें सम्मिलित हुये पर
भारतमाता की वहाँ उपस्थिति नहीं थी।”
गाँधी-इरविन समझौता : प्रथम गोलमेज सम्मेलन असफल रहा। 19 जनवरी, 1931 ई० को
बिना किसी निर्णय के यह समाप्त कर दिया गया। यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस के बिना कोई
संवैधानिक निर्णय नहीं लिया जा सकता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड तथा इरविन दोनों को ज्ञात हो गया कि कांग्रेस के बिना किसी संविधान का निर्माण नहीं किया जा सकता है। देश में उचित वातावरण बनाने के लिए इरविन ने कांग्रेस से प्रतिबन्ध हटा दिया तथा गाँधीजी तथा अन्य नेताओं को छोड़ दिया। अंतत: 5 मार्च, 1931 को गांधी व इरविन में समझौता हो गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापिस हो गया व द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग लेना स्वीकार कर लिया।
दूसरा गोलमेज सम्मेलन : गाँधी-इरविन समझौता के तहत दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस
को भाग लेना था। कांग्रेस की ओर से एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गाँधी ने भाग लिया।
मुस्लिम लीग से मुहम्मद अली जिन्ना से भाग लिया। 7 सितम्बर, 1931 ई० को दूसरा गोलमेज
सम्मेलन प्रारम्भ हुआ। गाँधीजी 12 सितम्बर को लन्दन पहुँचे। विभिन्न दल व वर्ग अपना-अपना
हित देख रहे थे। गाँधीजी ने कहा, “अन्य सभी दल साम्प्रदायिक हैं। कांग्रेस ही केवल सारे भारत
और सब हितों के प्रतिनिधित्व का दावा कर सकती है।”
तीसरा गोलमेज सम्मेलन : भारत मंत्री ने तीसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया। यह सम्मेलन
17 नवम्बर, 1932 ई० से 24 दिसम्बर, 1932 ई० तक चला। कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया
क्योंकि उसके सभी नेता जेल में बन्द थे।
                                              ★★★
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