Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 20 वस्त्रों की परिसज्जा

Bihar Board Class 11 Home Science वस्त्रों की परिसज्जा Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपड़ों की परिष्कृति की मुख्यतः विधियाँ हैं –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 2.
वस्त्र निर्माण के पहले या बाद में सफेदीपन लाने के लिए जो प्रक्रिया की जाती है उसे कहते हैं –
(क) विरजन
(ख) कैलेंडरिंग
(ग) टैटरिंग
(घ) मीराइजिंग
उत्तर:
(क) विरजन

प्रश्न 3.
टैंटरिंग की मशीन फुट लंबी होती है –
(क) 20-50
(ख) 20-60
(ग) 20-80
(घ) 20-70
उत्तर:
(घ) 20-70

प्रश्न 4.
कपड़े में सिलिकोन (Silicon) का प्रयोग किया जाता है –
(क) पानी रोकने के लिए
(ख) हवादार बनाने के लिए
(ग) गर्मी को कम करने के लिए।
(घ) पसीने से बचाव के लिए
उत्तर:
(क) पानी रोकने के लिए

प्रश्न 5.
स्रोतों के आधार पर रंगों को वर्गों में विभाजित किया गया है –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(क) दो

प्रश्न 6.
वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी इकाई [B.M.2009A]
(क) धागा
(ख) तंतु
(ग) कपड़ा
(घ) कताई
उत्तर:
(ख) तंतु

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्त

प्रश्न 1.
परिसज्जा (Finishing) का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
अर्थ (Meaning): तंतु व धागों के तैयार कपड़े को उचित रूप देने के लिए जो क्रियाएं की जाती हैं, उन्हें कपड़े की परिसज्जा कहा जाता है।

प्रश्न 2.
परिसज्जा का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
परिसज्जा का महत्त्व (Importance of Finishing): वस्त्रों पर विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएं विभिन्न लक्ष्यों को सामने रखकर की जाती हैं जिनसे वस्त्रों में अलग-अलग गुण
प्रस्फुटित होते हैं। यह गुण परिसज्जा को दर्शाते हैं। अतः परिसज्जा का ध्येय ही उसका महत्त्व है, जो निम्न हैं

  • वस्त्रों के बाहरी रूप को आकर्षित बनाना (To enhance the appearances of fabric)।
  • वस्त्र की उपयोगिता बढ़ाना (To enhance the utility of fabric)।
  • विभिन्नता लाना (To bring variety)।
  • at ont facilish GAH (To bring durability)
  • अनुकरण वस्त्र बनाना (To produce imitation fabrics)।

प्रश्न 3.
परिसज्जा को कितने वर्गों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर:
परिसज्जा के वर्गों (Types of Finishing) को दो भागों में बाँटा जा सकता है-(ii) आधारभूत परिसज्जाएं (Basic Finishes), (ii) विशिष्ट परिसज्जाएं (Special finishes)।

प्रश्न 4.
परिसज्जा के प्रकार (Types) लिखें।
उत्तर:
1. आधारभूत (Basic):

  • शुद्धिकरण (Cleaning)
  • विरंजन (Bleaching)
  • कड़ा करना (Sizing)
  • टेंटरिंग (Tantering)।

2. विशिष्ट (Special):

  • मसराइजेशन (Mercerisation)
  • सिकुड़न प्रतिरोधकता (Shrinking control)
  • जल अभेद्यता (Water proofing)
  • रंगाई (Dying)
  • छपाई (Printing)।

प्रश्न 5.
रंग को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
रंग (Colour):
किसी भी तन्तु या वस्त्र को रंगने के लिए जिस पदार्थ की आवश्यकता होती है, वह रंग कहलाता है।

प्रश्न 6.
विरंजन या ब्लीचिंग (Bleaching) से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
वस्त्रों से उनके मैले दिखते रंगों को तथा दाग-धब्बों को छुड़ाकर उनको स्वच्छ या । सफेद करने की प्रक्रिया विरंजन या ब्लीचिंग कहलाती है।

प्रश्न 7.
परिसज्जा के टिकाऊपन (Permanence of finishes) के आधार पर इसे कितने वर्गों में बांटा जाता है ?
उत्तर:
परिसज्जा के टिकाऊपन के आधार पर इसे दो वर्गों में बांटा गया है –
(i) अस्थाई परिसज्जा
(ii) स्थायी परिसज्जा।

प्रश्न 8.
कड़ा करना या साइजिंग (Sizing) को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कड़ा करना या साइजिंग कपड़ों में कड़ापन लाने के लिए की जाती है। सूती कपड़ों में मांड द्वारा व रेशमी वस्त्रों में गोंद द्वारा कड़ापन लाया जाता है। यह अस्थायी परिसज्जा है, जो धुलने पर निकल जाती है।

प्रश्न 9.
रंगाई से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
रंगाई (Dying) अर्थात् रंगों के प्रयोग से ऐसी परिसज्जा करना जिसके द्वारा कपड़े में आकर्षण और विविधता लाई जा सके।

प्रश्न 10.
छपाई (Printing) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
छपाई वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बने हुए वस्त्रों पर निश्चित डिजाइन में रंग लगाया जाता है।

प्रश्न 11.
छपाई (Printing) कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
(i) हाथ द्वारा छपाई (Hand Printing)।
(ii) मशीन द्वारा छपाई (Machine Printing)।

प्रश्न 12.
कपड़ों
पर लगे “सैन्फराइज्ड” चिह्न से आपको क्या जानकारी मिलती है ?
उत्तर:
सैन्फराइज्ड (Sanfarized) चिह्न इस गारंटी का निशान है कि वस्त्र सिकुड़ेगा नहीं।

प्रश्न 13.
कार्यानुरूप परिसज्जा (Functional finishing) क्या है ?
उत्तर:
जिन परिष्कृति एवं परिसज्जा की विधियों को उनके कार्य विशेष के लिए चुना जाता है, कार्यानुरूप परिसज्जा कहलाती है। जैसे-जलभेद्य (Water-proofing) परिष्कृति उसी वस्त्र पर दी जाती है जिन वस्त्रों के लिए जल से अप्रभावित रहना अनिवार्य है। जैसे-तिरपाल, बरसाती कपड़ा आदि । उज्ज्वलनशील परिसज्जा भी इसी प्रकार फायरमैन की पोशाक तथा अन्य अज्वलनशील वस्त्रों को दी जाती है।

प्रश्न 14.
बरसाती (Raincoat) पर कौन-सी परिसज्जा की जाती है ?
उत्तर:
जल अभेद्यता (Water Proofing)।

प्रश्न 15.
पर्वतारोही नाइलोन की रस्सी का प्रयोग क्यों करते हैं ?
उत्तर:
1. मजबूती (Strength)
2. हल्कापन (Lightness)।

प्रश्न 16.
Tie and Dye बंधेज करने का एक मुख्य सिद्धान्त लिखें।
उत्तर:
बंधेज में (Resist Printing) अवरोधक छपाई का सिद्धान्त प्रयोग में लाया जाता है तथा बंधे हुए स्थान पर रंग नहीं चढ़ता।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रंगाई की तीन मुख्य विधियों के बारे में लिखें? [B.M.2009A]
उत्तर:
कपड़ो को आकर्षक एवं सुन्दर बनाने के लिए रंगाई की जाती है। कपड़ों के अनुसार उपयुक्त रंग चुनाव करना पड़ता है। रंग रेशों में जितनी गहराई तक प्रवेश करता है उतना ही स्थाई रहता है रंगाई की मुख्य तीन विधियाँ निम्नलिखित हैं –

1. साधारण रंगाई (Simple Dyeing): इस विधि में रंगने वाले कपड़े को स्वच्छ पानी में भिगोकर निचोड़कर तैयार रंग के घोल में डुबो दिया जाता है उसे पक्का करने के लिए कुछ समय तक पकाया जाता है।

2. बंधेज (Tie and Dye): इस विधि में एक ही रेशे से बने कपड़े को नमूने के अनुसार कसा या बाँधा जाता है और रंग वाले गर्म (ऊबलते हुए) पानी में डुबोया जाता है । जहाँ पर कपड़ा बँधा हुआ होता है उस स्थान पर रंग नहीं चढ़ता।

3. बाटिक (Batik): इस विधि में मोम के गर्म घोल को डिजाइन के अनुसार कपड़े पर लगाया जाता है सुखने पर इसे मनचाहे रंग से रंगा जाता है मोम लगे स्थान पर रंग नहीं चढ़ता परन्तु बाकी जगहों पे रंग चढ़ता हैं। इस रंगाई में हमेशा ठंडे पानी का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
परिष्कृति तथा परिसज्जा की विधि के निर्णायक तत्त्व कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
परिष्कृति तथा परिसज्जा की अनेक विधियां हैं जिनके कारण वस्त्रों में बहुत परिवर्तन आ जाते हैं परन्तु ये सभी प्रक्रियाएं अलग-अलग वस्त्रों के लिए अलग-अलग हैं। इनका चुनाव आवश्यकतानुसार और प्रयोजन के अनुसार किया जाता है। इनमें से कुछ सभी वस्त्रों के लिए जरूरी हैं परन्तु शेष सभी में से चुनकर आवश्यकता के अनुसार इनका प्रयोग किया जाता है। इनका चयन करते समय कई बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, जैसे

1. रेशे की प्रकृति (Nature of fibre):
रेशों के भौतिक तथा रासायनिक गुणों को देखकर ही उनके लिए परिसज्जा का चुनाव किया जाता है अन्यथा वांछित प्रभाव की प्राप्ति नहीं हो पाती । रेशों की जल सोखने की क्षमता, रगड़, घर्षण, दबाव आदि का प्रभाव उसके द्वारा परिसज्जा को ग्रहण करने या न करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

2. धागे की किस्म तथा बुनाई (Quality of fibre & weaving process): साधारण बुनाई द्वारा बुने हुए ऐसे वस्त्र जिसमें एक ही प्रकार के वर्ग के रेशों का प्रयोग किया गया हो, किसी भी प्रकार की परिसज्जा को आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। बुनाई जितनी जटिल होती है, परिसज्जा देना उतना ही कठिन होता जाता है। अतः सादी बुनाई से तैयार वस्त्र की सतह की संग्राहकता (Receptivity) किसी भी प्रकार की परिसज्जा के लिए अच्छी रहती है परन्तु सजावट वाली बुनाइयां कठिनाई परिसज्जा ग्रहण कर पाती हैं।

प्रश्न 3.
सैन्फराइजिंग विधि किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सैन्फराइजिंग (Sanfarizing): यह एक व्यापारिक चिह्न है, जो इस बात का द्योतक है कि इस छाप का वस्त्र धुलाई के बाद नहीं सिकुड़ेगा। कभी-कभी कैलेण्डरिंग आदि परिसज्जा की विधियों में वस्त्र को जितना वास्तविक रूप से लम्बा तथा चौड़ा हो सकता है, उससे अधिक खींचकर लम्बा-चौड़ा कर दिया जाता है जिसके कारण पहली धुलाई में ही वह अपने वास्तविक रूप को प्राप्त हो जाता है जिसको हम सिकुड़ना कहते हैं।

इस क्षेत्र में कई प्रयत्न किए गए हैं ताकि वस्त्र धुलने के उपरान्त सिकुड़े नहीं। कई मशीनों का आविष्कार किया गया है जिनकी सहायता से फैले हुए वस्त्रों को उनकी परिष्कृति नष्ट किए बिना ही पूर्वाकार में लाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में वस्त्र भाप से गर्म किए सिलेण्डर की सतह पर कम्बल के मध्य से गुजरता है जहाँ इसे सिलेण्डर दबा देता है, जिससे-वस्त्र घना व चिकना होकर ठीक स्थिति में आ जाता है।

प्रश्न 4.
जल अभेद्यता (Water proofing) पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जल अभेद्यता (Water proofing): वस्त्रोद्योग में जल अभेद्य वस्त्रों के निर्माण कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इनका उद्देश्य पानी के प्रवेश को रोकना है । तिरपाल, बरसाती आदि इन गुणों का होना अनिवार्य है। तिरपाल का वस्त्र घटिया, भारी तथा सस्ता होता है तथा छूने व देखने में अनाकर्षक होते हैं क्योंकि इसको बनाने के लिए वस्त्र पर तारकोल आदि का लेप किया जाता है। बरसाती तथा अन्य जल अभेद्य पोशाकों के लिए प्रयोग में आने वाले वस्त्रों का कोमल व चिकना होना अनिवार्य है।

अतः इनमें प्रयुक्त सतह को रबर के घोल से लेप दिया जाता है। आजकल रबर के स्थान पर संश्लेषणात्मक राल (Resin) का प्रयोग किया जाने लगा। ये बुनाई के कारण बने छिद्रों को बंद कर देते हैं तथा पानी ऊपर से ही फिसलकर बह जाता है और भीतर प्रवेश नहीं कर पाता । वस्त्र का झिरझिरापन समाप्त हो जाने के कारण ये स्वास्थ्य और आराम की दृष्टि से अच्छे नहीं होते हैं। आजकल जल-निवारक कपड़े बनाने के लिए उन पर मोम का घोल और मेटेलिक लेप लगाया जाता है परन्तु यह परिसज्जा अस्थायी है।

प्रश्न 5.
टैन्टरिंग और कड़ापन लाने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
टैन्टरिंग (Tantering): विरंजन और रंगाई से कपड़े की कम हुई चौड़ाई को सामान्य चौड़ाई पर लाने की प्रक्रिया टैन्टरिंग कहलाती है। यंत्र के प्रयोग से वस्त्र को एक आकार व एक समान चौड़ाई वाला किया जाता है।
कड़ापन लाना (Stiffening): रेजनी, स्टार्च और अन्य प्लास्टिक पदार्थों के प्रयोग से ढीले कपड़े को आकार देकर चिकनापन व चमक लाने की प्रक्रिया को ‘कड़ापन लाना’ कहते हैं।

प्रश्न 6.
मीराइजिंग विधि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस प्रक्रिया द्वारा चमक पैदा की जाती है। इसके अंतर्गत विशेष रूप से तैयार कास्टिक सोडे के घोल में वस्त्र को दस मिनट के लिए डुबोया जाता है। इसके साथ उस पर एक समान मात्रा में ताप, तनाव तथा दबाव दिया जाता है और फिर कास्टिक सोडे को धोकर निकाल दिया जाता है। इस क्षार के प्रभाव से निष्फलन के लिए वस्त्र को तन अम्लीय घोल में डाल दिया जाता है और अंत में स्वच्छ पानी में धो डाला जाता है।

इस प्रक्रिया के प्रभाव से रेशे फूल जाते हैं तथा दबाव पड़ने से चपटे होकर बुनावट के छिद्रों को बंद कर देते हैं और रेशों के रासायनिक संगठन में परिवर्तन आ जाता है। रेशों के फूलने के कारण वे लम्बाई में सिकुड़ कर मोटाई में फैल जाते हैं जिससे वस्त्र की रचना सघन हो जाती है तथा उनकी सिकुड़न भी समाप्त हो जाती है। इस सघनता तथा समतल जमीन के कारण वस्त्र चिकना व चमकदार हो जाता है। वस्त्रों का सौंदर्य बढ़ने के साथ ही इसकी मजबूती बीस प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
सैन्फराइजिंग व मीराइजिंग में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सैन्फराइजिंग (Sanfarizing):
1. यह प्रक्रिया वस्त्रों को सिकुड़न निरोधक बनाने की है।

2. इसमें यांत्रिक विधि का प्रयोग भी किया जाता है। वस्त्र भाप में गर्म किये सिलेण्डर की सतह तथा कम्बल के मध्य से गुजरता है जहां से सिलेण्डर वस्त्र को दबा देता है जिससे वस्त्र घना व चिकना होकर ठीक स्थिति में आ जाता है।

3. इसमें मोलेमीन फॉरमेल्डराइड रेजिन व यूरिया फॉरमेल्डीहाइड रेजिन का प्रयोग करके कपड़े की लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई को स्थायी रूप दिया जाता है।

मीराइजिंग (Mercerizing):

  • यह प्रक्रिया वस्त्रों में चमक तथा शिकन दूर करने के लिए प्रयोग में लायी जाती है।
  • इसमें कास्टिक सोडे के घोल में वस्त्र को दस मिनट के लिए डुबोकर उस पर एक समान ताप, तनाव तथा दबाव दिया जाता है। फिर धोकर सोडे को निकाला जाता है। सोडे के प्रभाव को निष्फलन करने हेतु तनु अम्लीय घोल में डालकर अंत में स्वच्छ पानी से धोया जाता है।
  • इस प्रक्रिया के प्रभाव से रेशे फूल कर चपेपटे हो जाते हैं और वस्त्रों मे सघनता, चमक, चिकनाहट और आकर्षण आ जाता है।

प्रश्न 8.
रंगाई और छपाई में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. रंगाई (Dye): कपड़े, धागे या तंतु को प्राकृतिक या वानस्पतिक रंग से जिस प्रक्रिया द्वारा चढ़ाया जाता है, उसे रंगाई कहते हैं।
2. छपाई (Printing): जिस प्रक्रिया द्वारा बुने हुए वस्त्रों पर निश्चित डिजाइन में रंग लगाया जाता है, उसे छपाई कहते हैं।

प्रश्न 9.
सफाई (Cleaning) और विरंजन (Bleaching) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सफाई (Cleaning): वस्त्रों में से चर्बी, तेलयुक्त पदार्थ, गोंद तथा धातु द्वारा पैदा की गई अन्य अशुद्धियों को झुलसा कर, निघर्षण द्वारा मांड हटाकर, रोएँ काट कर ब्रश को साफ करने की प्रक्रिया ‘स्वच्छ करना’ कहलाती है।

विरंजन (Bleaching): वस्त्रों से उसके मैले दिखते रंगों को तथा दाग-धब्बों को छुड़ा कर श्वेत करने की प्रक्रिया विरंजन कहलाती है। प्राकृतिक तौर से सूर्य का प्रकाश एक विरंजक है, अन्यथा इस विधि में कृत्रिम विरंजकों का प्रयोग किया जाता है। ये विरंजक ऑक्सीकरण कर्मक (Oxidising agents) जैसे हाइड्रोजन परॉक्साइड या अपचयन प्रतिकर्मक (Reducing agents) जैसे जिंकडस्ट टिटेनस क्लोराइड आदि हो सकते हैं। सबसे सुरक्षित विरंजक-हाइड्रोजन पैरॉक्साइड है।

प्रश्न 10.
आपके पास ग्रे वसा (Grey Fabric) है। उसे आकर्षक बनाने के लिए आप कौन-कौन-सी परिसज्जा करेंगे?
उत्तर:

  • विरंजन करके व धोकर (Can be bleached and washed)
  • रंगाई करके (dyed)
  • छपाई करके (Printed)
  • प्रेस करके (Signing)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपड़े की परिसज्जा के महत्त्व को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
कपड़े की परिसज्जा का महत्त्व (Importance of cloth finishing): उपभोक्ताओं की आवश्यकतानुसार एवं रुचि अनुसार कपड़ा बनाने के लिए परिसज्जा का विशेष महत्त्व है।

वस्त्र परिसज्जा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
1. कपड़े के बाहरी स्वरूप (Appearance) को आकर्षक बनाना-कपड़ा बनाने की विभिन्न प्रक्रियाओं, जैसे-कताई, बुनाई आदि के समय कपड़े पर कारीगरों के हाथों अथवा मशीनों द्वारा धब्बे लग जाते हैं। इसके अतिरिक्त कपड़ा तैयार करने में काफी समय लगता है और वातावरण की गन्दगी व धूल भी बुने कपड़े को गन्दा कर देती है।

इस गन्दगी व धब्बों को दूर करने के लिए बुनने के पश्चात् कपड़े का ब्लीच (bleach) किया जाता है। ब्लीच करना एक प्रकार की परिसज्जा है। बुनाई करते समय कपड़े की सतह पर असावधानी के कारण छोटे-छोटे रुए उठ जाते हैं, कई बार कहीं-कहीं धागे की गांठें उभर जाती हैं तो कहीं कोई धागा छूट जाता है, जिससे कपड़े भद्दे लगते हैं और इनकी सतह खुरदरी हो जाती है। इन सबको दूर करने के लिए कपड़ों पर परिसज्जा की जाती है जिससे कपड़ा साफ, चिकना व आकर्षक हो जाता है।

2. कपड़ों की उपयोगिता को बढ़ाना (Increasing the utility of clothes): कपड़ा जब बुन कर तैयार होता है, उस समय वह ढीला, बेजान और प्रयोग करने के अनुकूल नहीं होता है । अतः ऐसे कपड़े को उपयोग नहीं किया जा सकता है। कपड़े की उपयोगी बनाने के लिए उस पर विभिन्न प्रकार से परिसज्जाएं की जाती हैं। रेशम के तन्तुओं को कातने योग्य बनाने के लिए उनके प्राकृतिक मोम को हटाना आवश्यक है और इस गोंद उतारने की प्रक्रिया को गोंद उतारना (Degumming) कहते हैं।

इस प्रक्रिया द्वारा कपड़ा हल्का हो जाता है। फिर इस रेशम के कपड़े की उपोगिता को बढ़ाने के लिए कृत्रिम तरीकों से उनका वजन बढ़ाया जाता है जिस कपड़े की परिसज्जा करना है। इसी प्रकार बुनाई के पश्चात् कपड़ों में कड़ापन लाने के लिए उन पर कलफ या गोंद लगाया जाता है। कपड़े पर कलफ या गोंद लगाना भी एक प्रकार की परिसज्जा है।

3. कपड़ों को अधिक टिकाऊ (Durable): बनाना-बुने हुए कपड़े को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए भी परिसज्जाएं की जाती हैं। कपड़ों के ढीलेपन को दूर करने के लिए, बुनाई की सघनता को बढ़ाने के लिए या फिर कपड़ों को फफूंदी व कीड़ों से बचाने के लिए कपड़ों पर विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएं की जाती हैं। इन्हीं परिसज्जाओं के कारण ही कपड़ा अधिक टिकाऊ हो जाता है और बिना खराब हुए अधिक समय तक प्रयोग किया जाता है।

4. कपड़ों में विविधता लाना (To bring variety in fabrics): जब कपड़ा बुनकर तैयार होता है, तब उसका रूप एक समान होता है। इस एक समान रूप वाले कपड़े को प्रयोग करना पसन्द नहीं किया जा सकता है। अतः वस्त्र में विविधता लाना अनिवार्य है। कपड़े में विविधता लाने के लिए विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएँ की जाती हैं। ये परिसज्जाएँ रंग एवं डिजाइन द्वारा की जाती हैं। विभिन्न प्रकार की डिजाइनों तथा छपाई द्वारा वस्त्रों में विविधता लाई जाती है। विविधता से वस्त्र का महत्त्व तथा आकर्षण बढ़ता है।

5. अनुकरणीय वस्त्र बनाना (To manufacture quality fabrics)-कुछ कपड़े ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी विशिष्ट परिसज्जा द्वारा किसी अन्य उत्तम प्रकार के कपड़े के समान बनाया जाता है। इस प्रकार की परिसज्जा से अनुकरणीय वस्त्र तैयार किये जाते हैं। जैसे-पापलीन के कपड़ों को मर्सिराइजिंग की परिसज्जा द्वारा एक विशेष चमक प्रदान की जाती है, जिससे ये रेशम के समान प्रतीत होने लगते हैं।

प्रश्न 2.
विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएँ कौन-कौन-सी हैं ? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की परिसज्जाएँ निम्नलिखित है –
सामान्य परिसज्जाएँ –
सफाई (Cleaning), विरंजन (Bleaching), कड़ापन लाना (Stiffening), टैंटरिंग (Tantering)।

विशेष परिसज्जाएं –
मीराइजिंग (Mercerizing), सिकुड़न-नियंत्रण (Shrinkage), जल अभेद्यता (Water proofing), रंगाई (Dying), छपाई (Printing)।

सामान्य परिसज्जाएँ (Normal finishes):
1. सफाई (Cleaning): ग्रे कपड़े में गोंद, प्राकृतिक मोम, प्राकृतिक नाइट्रोजनीकृत पदार्थ, प्रक्रिया के समय के तेल, मांड आदि रह जाती हैं। ब्लीचिंग, रंगाई और दूसरी परिसज्जा के पहले इन सबको निकालना आवश्यक है। सफाई को शुद्ध करना (Scouring) तथा Kier Boiling भी कहते हैं। सफाई निम्नलिखित चरणों में होती हैं –
(क) ग्रे को साबुन से धोने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि उत्पादन के समय के रसायन दूर हो गए हैं। बुनने से पहले भागों को सरेस लगाया जाता है, जो धोने से निकल जाता है।
(ख) कास्टिक सोडा, गीले करने वाले तत्त्व का तैलीय तत्त्वों आदि के प्रयोग से मोम दूर हो जाता है।
(ग) ग्रे में उपस्थित गंदगी के अनुसार व कास्टिक की सांद्रता पर सफाई का स्तर आधारित होता है। इच्छित सफाई के लिए यह सारी प्रक्रिया दुबारा भी की जा सकती है।
(घ) मोम, गंदगी व रसायनों को निकालने के लिए अच्छी प्रकार से खंगालना आवश्यक होता है।

2. विरंजन (Bleaching): धूप में प्राकृतिक विरंजन की शक्ति होती है। सफेद कपड़ों को धोने के बाद धूप में सुखाना एक अच्छी आदत है। कपड़े को घास या झाड़ियों पर सुखाया जाए तो क्लोरोफिल की प्रक्रिया स्वरूप यह और भी उत्तम है। कपड़े का विरंजन अपचयन (reducing) या ऑक्सीकरण (oxidation) ब्लीच से किया जा सकता है।

अपचयन ब्लीच अधिक समय तक नहीं चलते व कपड़ा थोड़ी देर बाद फिर पहले रंग में आ जाता है। हाइड्रोजन परॉक्साइड एक ऑक्सीकरण ब्लीच है और लगभग हर प्रकार के कपड़े पर प्रयोग किया जाता है। एक गैलन हाइड्रोजन परॉक्साइड के घोल में 5 मिलि. अमोनिया या सोडियम परबोरेट मिलाने से क्रिया बेहतर होती है। विरंजन के बाद कपड़े को अच्छी तरह खंगालना चाहिए। अधिक ब्लीच प्रयोग करना हानिकारक सिद्ध होता है।

लम्बी अवधि तक सफेदी के लिए नील लगाना चाहिए। कपड़ों को पोटैशियम परमैगनेट द्वारा भी ब्लीच किया जा सकता है। पसीने और फफूंदी के दाग भी इससे दूर हो जाते हैं। 3 ग्राम परमैगनेट को 1 लीटर पानी में घोलें। विरंजन वाले कपड़े को इसमें डालें। पहले यह कपड़े को मटमैला-सा बना देता है। फिर इसे 6 ग्राम प्रति लीटर वाले ऑक्जेलिक अम्ल के घोल में डालें तथा अच्छी-तरह खंगालें। कपड़ों के विरंजन के लिए अक्सर ब्लीचिंग पाउडर (CaCI(OCI)4H2O) प्रयोग में लाया जाता है।

3. कड़ापन लाना (Stiffening): जब कपड़े को भार/आकार देना हो तो उसमें कड़ापन लाते हैं। कड़ापन देने से कपड़े में चमक आती है तथा मैल अवरोधकता बढ़ती है। रेसिन, स्टार्च और अन्य प्लास्टिक पदार्थों के प्रयोग से कडापन थोडी देर के लिए होता है तथा कपडे के ढीले होने पर ग्राहक अप्रसन्न हो जाते हैं। रेशम सामान्यतया वजन से बेचा जाता है। हल्के रेशम पर यह प्रक्रिया करने से उसे भार व कड़ापन मिलता है। रेसिन और स्टार्च लगाने से कपड़ा चमकदार व चिकना दिखाई देता है। अतः उसका विक्रय मूल्य और ग्राहक की पसंद बढ़ जाती है।

4. टैंटरिंग (Tantering): विरंजन और रंगाई से कपड़े की चौड़ाई कम हो जाती है । टैंटरिंग कपड़े की सामान्य चौड़ाई पर लाने की प्रक्रिया है। थोड़ा-सा गीला कपड़ा टैंटरिंग यंत्र में से निकाला जाता है। कपड़े को खूब खींचकर सीधा तथा सिलवटमुक्त करके सुखाया जाता है। इस प्रकार कपड़ा अपनी सामान्य चौड़ाई बनाए रखता है।

विशेष परिसज्जाएँ (Some Special Finishes):
1. मीराइजिंग (Mercerizing): यह प्रक्रिया सूती व मिश्रित सूती (टेरीकॉट) कपड़ों पर की जाती है। सूती वस्त्र की क्षार के साथ क्रिया की जाती है जिससे उसकी चमक बढ़ जाती है तथा रंगना आसान हो जाता है। इस परिसज्जा के निम्नलिखित चरण हैं –
(क) सूती कपड़े को अच्छी प्रकार भिंगो लें।
(ख) कपड़े को कास्टिक सोडा (NaOH) के 18-20 प्रतिशत घोल में लगभग 15 मिनट के लिए डुबो दें। इस समय कपड़े को एक निश्चित ताप एवं दबाव में रखें।
(ग) कपड़े को निष्क्रिय पानी से धोएं।
(घ) पानी से अच्छी प्रकार खंगालें।

इस प्रक्रिया से कपड़े में भौतिक व रासायनिक परिवर्तन आ जाते हैं। क्षार से सूती तंतु फूल जाते हैं, इससे उनकी ऐंठन दूर हो जाती है। परिणामतः कपड़े में चमक आ जाती है।

2. सिकुड़न-नियंत्रण (Shrinkage control): सेलुलोज तंतुओं जैसे सूती, फ्लैक्स, जूट, नारियल की जटा आदि को जब बुना जाता है तो उनका आकार बिगड़ने की स्थिति में होता है। ग्रे कपड़े को चरख के लिए (दो रोलरों के बीच) खींचा जाता है ताकि कपड़े की ऊपरी सतह चिकनी व घनी हो जाए। इस प्रकार कपड़े की लम्बाई बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया से बढ़ी हुई लंबाई सिकुड़ना चाहती है। आधुनिक युग में कपड़ों पर “दबाव-सिकुड़न” विधि अपनाई जाती है।

इस विधि के पश्चात् कपड़े में 2 प्रतिशत से अधिक सिकुड़न नहीं होती। गीले कपड़े को रोलर द्वारा खींचकर एक दूसरे गर्म रोलर से तने हुए कपड़े को दबाया जाता है। जैसे ही तना हुआ कपड़ा (या रबड़ का कंबल) रोलर से बाहर आता है वैसे ही कंबल की बाहरी सतह फैल कर कपड़े से चिपक जाती है।

जब कंबल ठंडा होता है तो कपड़े के साथ ही सिकुड़ जाता है। इस प्रकार कपड़ा दबाव से जितना छोटा होना होता है, हो जाता है। इस परिसज्जा का ही परिणाम है कि बाजार में कपड़ा गारंटी के साथ मिलता है कि अमुक वस्त्र सिकुड़ेगा नहीं। ऐसी गारंटी का निशान ‘Sanfrizing’ है। कपड़े पर यह निशान नियमित दूरी पर ग्राहक की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है।

3. जल अभेद्य परिसज्जा (Water proofing): जल अभेद्यता से अभिप्राय है कि कपड़े की सतह पर पानी नहीं टिकता। जल अभेद्य बनाने के लिए कपड़े पर कोलतार पदार्थों से लेप किया जाता था। ऐसा कपड़ा हवा को भी रोक लेता था। इसी कारण ऐसे कपड़े से वस्त्र बनाना असंभव था। इससे पहले रबड़ या वार्निश का लेप किया जाता था पर इससे भी कपड़ा भारी हो जाता था।

इससे कार ढकने का कपड़ा या बरसाती आदि बनाई जाती थी। आधुनिक युग में रबड़ को रेसिन से बदल दिया गया है। अब एल्युमीनियम की इमलशन के लेप से भी ऐसा कपड़ा बनाया जा रहा है। यह आसानी से प्रयोग किया जाता है तथा इसे कपड़े में सुखाया जा सकता है। दोहरा लेप लगाने से बेहतर जल अभेद्य कपड़ा बनाया जा सकता है, जिससे बरसाती व स्कूल के बस्ते बनाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
कपड़ों पर छपाई (Printing) से क्या अभिप्राय है ? छपाई की मुख्य विधियाँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:
कपड़ों की छपाई (Cloth Printing): प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने कपड़ों पर विभिन्न प्रकार के डिजाइन बनाते रहे हैं। भारत में सहस्रों वर्षों से हाथ की छपाई द्वारा कपड़ों पर आकर्षक नमूने बनाए जाते हैं। छपाई की यह कला जावा, सुमात्रा व धीरे-धीरे यूरोपीय देशों में लोकप्रिय हुई। भारत में आज भी कुशल कारीगर विभिन्न रंगों से विभिन्न डिजाइनों के चमकीले, रोचक व आकर्षक कपड़े तैयार करते हैं।

प्राय: यह कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में परम्परागत रूप से जाती है। पूरे विश्व में भारतीय परम्परागत डिजाइन बहुत लोकप्रिय हैं, जिससे छपे हुए भारतीय कपड़ों की मांग बहुत बढ़ गई है और इनके निर्यात से बहुत-सी विदेशी मुद्रा कमाई जाती है।

प्रारम्भिक काल में वस्त्रों पर छपाई का कार्य हाथ से किया जाता था। नमूने को लड़की के गुटकों पर उल्टा खोद कर उसे रंग में डुबो कर कपड़े पर ठप्पे लगाकर छपाई की जाती थी। अब छपाई मशीनों द्वारा की जाती है तथा छपाई के लिए विभिन्न प्रकार की विधियाँ अपनाई जाती हैं।

1.ब्लॉक छपाई (Block Printing): वस्त्र की छपाई की एक विधि ‘ब्लॉक द्वारा छपाई’ करना है। हमारे देश में अति प्राचीन काल से ही वस्त्रों की छपाई के लिए इस विधि को अपनाया जा रहा है। यह एक लोकप्रिय एवं अत्यधिक प्रचलित वस्त्र-छपाई की विधि है। वस्त्रों पर ब्लॉक द्वारा दो प्रकार की छपाई की जाती है। प्रथम प्रकार की छपाई हाथ द्वारा की जाती है तथा दूसरी प्रकार की छपाई मशीन द्वारा की जाती है।

1. हाथ द्वारा की जाने वाली ब्लॉक छपाई (Block printing by hand): हाथ द्वारा की जाने वाली ब्लॉक छपाई अति प्राचीन काल से प्रचलित है। इस क्रम में पेड़ के सूखे तने को काटकर ब्लॉक बना लिये जाते थे। सूखे तने की लकड़ी में कुछ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक डिजाइन होते है। इन लकड़ी के ब्लॉक को अभीष्ट रंग में डुबोकर कपड़े को छाप लिया जाता था।

इस प्रकार वस्त्र पर अनेक प्राकृतिक डिजाइन छापे जाते थे, परंतु जैसे-जैसे सभ्यता एवं कारीगरी का विकास हुआ, वैसे-वैसे मनुष्य ने स्वयं विभिन्न डिजाइनों वाले लकड़ी के गुटके बनाए। छपाई के गुटके बनाने के लिए मज त तथा चिकनी लकड़ी में लगभग 1/4″ गहरे विभिन्न प्रकार के डिजाइन खोदे जाते हैं।

ये डिजाइ कुछ भी हो सकते हैं जैसे कि फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षी या अन्य कोई भी आकृति। यह गुटवं विभिन्न आकार के बनाए जा सकते हैं। तैयार लकड़ी के गुटकों को छपाई के लिए प्रयोग लिया जाता है। गुटकों या ब्लॉक द्वारा छपाई करने के लिए वस्त्र को कम्बल से ढंकी मेज पर फैलाते हैं।

गुटकों पर रंग लगाकर विशेष सावधानी से इन्हें वस्त्र पर सही स्थान पर छापा जाता है। गुटकों पर लगाने वाले रंग तरल, अर्द्ध तरल अथवा पेस्ट के रूप में होते हैं। विभिन्न रंगों की छपाई के लिए उसी के अनुसार अलग-अलग गुटके प्रयोग किये जाते हैं। हथकरघे द्वारा निर्मित सूती वस्त्रों पर इन हाथ के गुटकों से बहुत अच्छी छपाई होती है।

2. मशीन द्वारा की जाने वाली ब्लॉक छपाई-उन्नीसवीं शताब्दी में मशीन द्वारा ब्लॉक छपाई आरम्भ हुई। इटली, इंगलैंड तथा फ्रांस आदि देशों में कपड़ों की छपाई मशीनों द्वारा होने लगी। आजकला तो विश्व भर में मशीनों द्वारा कपड़ों की छपाई की जाती है। इन मशीनों में रोलर लगे होते हैं। इन रोलर्स पर तांबे या लिनालियम के बने हुए डिजाइन होते हैं। रोलर पर अभीष्ट रंग द्वारा वस्त्र पर छपाई की जाती है। कपड़ा घूमते हुए ब्लॉक में से निकलता है और छपता जाता है। इस विधि द्वारा छपाई बहुत सफाई से होती है।

II. स्क्रीन छपाई (Screen Printing): कपड़ों की छपाई करने की एक विधि स्क्रीन छपाई (Screen Printing) है। यह छपाई भी हाथ द्वारा की जाती है। इस प्रकार की छपाई के लिए एक फ्रेम का प्रयोग किया जाता है। जिस कपड़े पर छपाई करनी होती है उसे एक समतल मेज पर बिछा लिया जाता है। इसके बाद कपड़े पर फ्रेम को रखा जाता है तथा हाथ से रंग लगाया जाता है।

नमूने में जहां रंग नहीं लगाना होता उन स्थानों पर कोई अवरोधक लगा दिया जाता है। इस प्रकार एक के बाद दूसरे स्थान पर फ्रेम को रखकर छपाई की जाती है। इस विधि द्वारा छपाई में काफी समय लगता है, अत: यह एक महंगी विधि है। स्क्रीन प्रिटिंग द्वारा भी कई रंगों की छपाई की जा सकती है। अलग-अलग रंग की छपाई के लिए अलग-अलग फ्रेम तथा नमूने का प्रयोग किया जाता है।

III. स्टेंसिल छपाई (Stencil Printing): वस्त्रों पर छपाई करने के लिए एक अन्य विधि को स्टेंसिल छपाई कहते हैं। इस विधि का प्रारम्भ जापान में हुआ था। स्टेंसिल प्रिंटिंग की विधि स्क्रीन प्रिंटिंग के ही समान है। स्टेंसिल प्रिंटिंग के लिए किसी धातु की महीन पर्त को या मोम से चिकने कागज को किसी अभीष्ट डिजाइन के अनुसार काट लिया जाता है।

डिजाइन के एक रंग के लिए एक स्टेंसिल काटा जाता है। यदि डिजाइन में एक से अधिक रंग हों तो रंगों के अनुसार एक से अधिक स्टेंसिल काटे जाते हैं। वस्त्र पर स्टेंसिल रखकर रंग लगा दिया जाता है। रंग लगाने का काम हाथ के ब्रुश, एयर ब्रुश या दबाव से चलने वाली स्प्रे गन से किया जाता है।

IV. रोलर छपाई (Roller Printing): वस्त्र छपाई की एक अन्य विधि छपाई है। रोलर प्रिंटिंग एक खास प्रकार की मशीन द्वारा की जाती है। इस मशीन का आविष्कार फ्रांस में हुआ था। इस मशीन में रोलर्स पर नमूने बने होते हैं तथा इन्हीं से कपड़े पर छपाई होती है। प्रारम्भ में रोलर प्रिंटिंग के लिए इन रोलर्स पर हाथ द्वारा ही सुन्दर नमूने अंकित किये जाते थे, परन्तु बाद में रोलर्स पर डिजाइन फोटो मशीन द्वारा अंकित किये जाने लगे हैं। इससे डिजाइन अधिक महीन एवं उत्कृष्ट प्रकार के बनते हैं। रोलर्स द्वारा छपाई विभिन्न विधियों द्वारा की जाती है जो निम्नलिखित हैं :

1. रोलर छपाई की प्रत्यक्ष विधि-रोलर मशीन द्वारा कपड़ों पर छपाई करने की सबसे साधारण विधि को प्रत्यक्ष विधि (Direct method) कहते हैं। इस विधि में रोलर्स व डिजाइन बनाए जाते हैं तथा उन पर रंग लगाकर कपड़े को रोलर्स के बीच में गुजारा जाता है जिससे कपड़े पर डिजाइन छप जाता है। इस विधि के अन्तर्गत यदि एक से अधिक रंगों की छपाई करनी हो तो एक से अधिक रोलर्स प्रयोग करना पड़ता है।

2. रंग खींचने वाली छपाई-रोलर्स द्वारा छपाई करने की एक विधि को ‘रंग खींचने वाली छपाई” (Discharge Printing) कहते हैं। यह विधि प्रत्यक्ष विधि से कुछ भिन्न है। इस विधि के अन्तर्गत सर्वप्रथम पूरे कपड़े को किसी गहरे रंग में रंग लिया जाता है। उसके बाद जैसा नमूने के रूप में है, अंकित कर दिया जाता है। इसके लिए रोलर पर अंकित डिजाइन के ऊपर जिंक ऑक्साइड का पेस्ट लगा दिया जाता है।

गहरे रंग में रंगे हए वस्त्र को रोलर्स के मध्य से गुजारा जाता है। रोलर्स में लगे ब्लीच द्वारा नमूने के आकार में वस्त्र सफेद हो जाता है। इस कपड़े को शीघ्र ही भाप द्वारा सुखा लेते हैं तथा सूखे हुए वस्त्र को साफ पानी में से धो लेते हैं। इस प्रकार गहरे रंग पर सफेद डिजाइन बहुत सुन्दर एवं आकर्षक लगता है। रोलर छपाई की इस विधि में प्रबल विरंजक प्रयोग किया जाता है जिससे कपड़ा उस जगह से कमजोर हो जाता है और शीघ्र फटता है। इस विधि में यह दोष होते हुए भी यह छपाई में एक विशेष महत्त्व रखती है।

3. अवरोधक छपाई (Resist Printing): रोलर्स छपाई की एक अन्य विधि अवरोधक छपाई है। यह विधि रंग खींचने वाली विधि के विपरीत है। इस विधि के अन्तर्गत रोलर पर डिजाइन अंकित किया जाता है तथा कपड़े को रोलर्स के मध्य गुजारा जाता है। इससे वस्त्र पर प में अवरोधक पदार्थ लग जाता है। इसके बाद परे वस्त्र को इच्छित रंग में रंग लिया जाता है। इस प्रकार रंगने से पूरा वस्त्र तो रंगा जाता है, परन्तु अवरोधक लगे स्थान पर सफेदी ही रहती है। वस्त्र को धोकर अवरोधक पदार्थ हटा दिया जाता है। इस प्रकार वस्त्र पर सुन्दर छपाई हो जाती है।

4. ड्यूपलेक्स छपाई (Duplex Printing): रोलर्स द्वारा छपाई की एक अन्य विधि को ड्यूपलेक्स छपाई कहते हैं। इस विधि के अन्तर्गत छपाई के लिए कपड़े को क्रमश: दो रोलर्स के मध्य से गुजारा जाता है। पहले रोलर के मध्य से गुजरने पर कपड़े के एक ओर नमूना छप जाता है। इसके बाद दूसरे रोलर्स द्वारा वस्त्र पर दूसरी ओर नमूना छप जाता है।

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