Bihar Board Class 12th Geography Notes Chapter 18 निर्माण उद्योग

 Bihar Board Class 12th Geography Notes Chapter 18 निर्माण उद्योग

Bihar Board Class 12th Geography Notes Chapter 18 निर्माण उद्योग

→ अर्थ एवं महत्त्व

  • कच्चे और अर्द्ध निर्मित माल को मशीनों की सहायता से उपयोगी निर्मित माल में बदलने वाले उद्योग ‘विनिर्माण उद्योग’ कहलाते हैं।
  • किसी भी राष्ट्र की शक्ति एवं आर्थिक विकास को वहाँ के औद्योगिक स्तर से आँका जाता है। उद्योगों से आजीविका मिलती है जिसके फलस्वरूप लोगों के धन में वृद्धि होती है। धन में वृद्धि होने से लोगों का जीवन-स्तर ऊँचा उठता है तथा विदेशी मुद्रा की बचत होती है।

→ उद्योगों के प्रकार
उद्योगों के वर्गीकरण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं
(I) आकार, पूँजी निवेश एवं श्रम-शक्ति के आधार पर (1) बड़े पैमाने के उद्योग, (2) मध्यम पैमाने के उद्योग, एवं (3) छोटे पैमाने के उद्योग।

(II) स्वामित्व के आधार पर (1) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग, (2) व्यक्तिगत (निजी) क्षेत्र के उद्योग (3) सहकारी क्षेत्र के उद्योग एवं (4) मिश्रित क्षेत्र के उद्योग।

(III) उत्पादों के उपयोग के आधार पर (1) मूल पदार्थ उद्योग, (2) पूँजीपति पदार्थ उद्योग, (3) मध्यवर्ती पदार्थ उद्योग एवं (4) उपभोक्ता पदार्थ उद्योग। .

(IV) कच्चे माल के स्त्रोत के आधार पर (1) कृषि आधारित उद्योग, (2) खनिज आधारित उद्योग, (3) वन आधारित उद्योग, (4) चरागाह आधारित उद्योग, एवं (6) निर्मित वस्तुओं की प्रकृति के आधार पर।

→ उद्योगों का स्थानीकरण
उद्योगों के स्थानीकरण को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है (I) भौगोलिक कारक, एवं (II) गैर-भौगोलिक कारक।

(I) भौगोलिक कारक-(1) कच्चा माल, (2) शक्ति के साधन, (3) सस्ता श्रम, (4) परिवहन एवं संचार, (5) बाजार, एवं (6) सस्ती भूमि तथा जलापूर्ति आदि।

(II) गैर-भौगोलिक कारक-(1) पूँजी, (2) औद्योगिक नीति, (3) औद्योगिक जड़त्व अथवा प्रारम्भिक संवेग, (4) बैंकिंग सुविधा, (5) बीमे की सुविधा एवं (6) राजनीतिक स्थिरता आदि।

→ प्रमुख उद्योगों का वितरण

1. लौह-इस्पात उद्योग-लौह-इस्पात उद्योग को ‘आधारभूत उद्योग’, ‘अन्य उद्योगों की जननी’ एवं ‘Key Industry’ भी कहा जाता है। इस उद्योग में लौह-अयस्क, कोक कोयला, चूना पत्थर, डोलोमाइट, मैंगनीज व अग्नि सह मृत्तिका आदि कच्चे माल की आवश्यकता होती है।
तथ्य

→ भारत के प्रमुख इस्पात कारखाने

  1. टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (TISCO)
  2. इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (IISCO)
  3. विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (VISW)
  4. राउरकेला स्टील प्लाण्ट
  5. भिलाई स्टील प्लाण्ट
  6. दुर्गापुर स्टील प्लाण्ट
  7. बोकारो स्टील प्लाण्ट
  8. विजयनगर स्टील प्लाण्ट
  9. विजाग स्टील प्लाण्ट, एवं
  10. सेलम स्टीम प्लाण्ट।

→ लौह इस्पात उद्योग की प्रमुख समस्याएँ

  1. पूँजी का अभाव,
  2. माँग में कमी,
  3. इस्पात उत्पादन की ऊँची लागत,
  4. आयातित लोहे से प्रतिस्पर्धा,
  5. देशज तकनीक की कमी,
  6. कोकिंग कोयले की कमी,
  7. विशिष्टीकरण की कमी एवं
  8. निर्यात में कमी आदि।

2. सूती वस्त्र उद्योग–सूती वस्त्र उद्योग भारत के परम्परागत उद्योगों में से एक है। भारत में इस उद्योग के विकास के प्रमुख कारण-उष्ण कटिबन्धीय जलवायु, कपास की उपलब्धता एवं कुशल श्रमिकों की उपलब्धता आदि हैं। देश में सूती वस्त्र निर्माण की पहली सफल मिल मुम्बई में सन् 1854 में कावसजी नानाभाई डावर ने लगाई। देश में सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र महाराष्ट्र (मुम्बई), गुजरात (अहमदाबाद), पश्चिम बंगाल (कोलकाता), उत्तर प्रदेश (कानपुर), तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में हैं।

3. चीनी उद्योग–वर्तमान में यह देश का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि आधारित उद्योग है। भारत विश्व में गन्ना और चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक है। चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग है। देश में चीनी बनाने का आधुनिक कारखाना सन् 1903 में बिहार में लगाया गया।, देश में चीनी उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य-महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश आदि हैं।

4. पेट्रो-रसायन उद्योग-उद्योगों का यह वर्ग भारत में तेजी से विकसित हो रहा है। इस उद्योग में प्लास्टिक, संश्लेषित रेशा, संश्लेषित रबड़ व संश्लेषित अपमार्जक आदि वस्तुएँ बनाई जाती हैं। पेट्रो-रसायन उद्योग के प्रमुख चार उपवर्ग हैं (1) बहुलक, (2) संश्लेषित रेशे, (3) प्रत्यास्थापक एवं (4) पृष्ठ सक्रियक।
सन् 1961 में मुम्बई में नैप्था पर आधारित पहला कारखाना द नेशनल ऑर्गेनिक कैमिकल्स इण्डस्ट्रीज लि0 (NOCIL) लगाया गया। सन् 1966 में यूनियन कार्बाइड इण्डिया लि० ने मुम्बई के समीप ट्राम्बे नामक स्थान पर पेट्रो-रसायन का कारखाना लगाया।

5. ज्ञान आधारित उद्योग-वे उद्योग जिन्हें उत्पादन के लिए उच्चस्तरीय विशिष्ट ज्ञान, उच्च
प्रौद्योगिकी और निरन्तर शोध, अनुसन्धान तथा सुधार की आवश्यकता होती है, ‘ज्ञान आधारित उद्योग’ कहलाते हैं।

ज्ञान आधारित उद्योगों के उदाहरण-सॉफ्टवेयर, कम्प्यूटर हार्डवेयर, वैज्ञानिक उपकरण तथा प्रणालियाँ, लेजर व सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिकी, चिकित्सा उपकरण, अन्तरिक्ष उपकरण, परमाणु ऊर्जा संयन्त्रों की मशीनें आदि।

→ भारत में उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण एवं औद्योगिक विकास
नई औद्योगिक नीति की घोषणा सन् 1991 में की गई। इसके लक्ष्य हैं –
(1) उदारीकरण, (2) निजीकरण एवं (3) वैश्वीकरण।

  1. उदारीकरण से अभिप्राय नियमों व प्रतिबन्धों में ढील देने या उसमें उदारता बरतने से है।
  2. निजीकरण के अन्तर्गत निजी लोग किसी सरकारी उद्यम का मालिक बन जाता है अथवा प्रबन्ध करता है।
  3. वैश्वीकरण का अर्थ देश की अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है।

→ भारत के औद्योगिक प्रदेश

  • उद्योगों के कुछ विशेष क्षेत्रों में केन्द्रित हो जाने को औद्योगिक समूहन अथवा गुच्छ कहा जाता है।
  • भारत के प्रमुख 8 औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं
    1. मुम्बई-पुणे प्रदेश,
    2. हुगली प्रदेश,
    3. बंगलुरु-तमिलनाडु प्रदेश,
    4. गुजरात प्रदेश,
    5. छोटा नागपुर प्रदेश,
    6. विशाखापट्टनम-गुंटूर प्रदेश,
    7. गुरुग्राम-दिल्ली-मेरठ प्रदेश,
    8. कोलम-तिरुवनंतपुरम प्रदेश।

→ विनिर्माण उद्योग-कच्चे और अर्द्ध-निर्मित माल को मशीनों की सहायता से उपयोगी निर्मित माल में बदलने वाले उद्योग।

→ बड़े पैमाने के उद्योग-इन उद्योगों में बहुत बड़ी संख्या में कुशल व अकुशल श्रमिक कार्य करते हैं और विविध प्रकार का कच्चा माल, पूँजी, शक्ति आदि का प्रयोग करते हैं।

→ छोटे पैमाने के उद्योग-ये वे उद्योग हैं जिनमें परिवार के सदस्य मिलकर सरल विधियों से छोटी-छोटी वस्तुओं का निर्माण करते हैं।

→ सार्वजनिक सेक्टर के उद्योग-ये सरकार द्वारा नियन्त्रित कम्पनियाँ या निगम होते हैं, जिन्हें सरकार फण्ड प्रदान करती है।

→ आधारभूत पदार्थ उद्योग-जिन उद्योगों का निर्मित माल अन्य उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होता है; जैसे-लौह-इस्पात, विद्युत उत्पादन तथा भारी मशीन निर्माण उद्योग आदि।

→ ज्ञान आधारित उद्योग-वे उद्योग जिन्हें उत्पादन के लिए उच्चस्तरीय विशिष्ट ज्ञान, उच्च प्रौद्योगिकी और निरन्तर शोध, अनुसन्धान तथा सुधार की आवश्यकता रहती है।

→ उदारीकरण-उदारीकरण का अभिप्राय है उद्योग और व्यापार को अनावश्यक प्रतिबन्धों से मुक्त करके अधिक प्रतियोगी बनाना।

→ निजीकरण-निजीकरण का अर्थ है देश के अधिकतर उद्योगों के स्वामित्व, नियन्त्रण तथा प्रबन्ध को निजी क्षेत्र के अन्तर्गत किया जाना।

→ वैश्वीकरण – मुक्त व्यापार तथा पूँजी और श्रम की मुक्त गतिशीलता द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को अन्य देशों की अर्थव्यवस्था से जोड़ना ही वैश्वीकरण है।

→ बहुराष्ट्रीय कम्पनी-ऐसी कम्पनी जो किसी एक देश में स्थित मुख्यालय से अनेक देशों में उत्पाद और सेवाओं का नियन्त्रण करती है। इसे राष्ट्रपारीय कम्पनी भी कहते हैं।

→ औद्योगिक समूहन-उद्योगों का कुछ विशेष क्षेत्रों में केन्द्रित हो जाना।

→ व्यक्तिगत सेक्टर उद्योग-जिन उद्योगों का स्वामित्व एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों या किसी परिवार के पास होता है।

→ कृषि आधारित उद्योग-ये वे उद्योग हैं जो कृषि उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करते हैं; जैसे-सूती वस्त्र, पटसन एवं रेशमी वस्त्र उद्योग आदि।

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